शायर बशीर बद्र का 91 साल की उम्र में निधन, भोपाल में ली अंतिम सांस
भोपाल: उर्दू गज़ल के शहंशाह डॉ. बशीर बद्र का 91 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने गुरुवार दोपहर 12:15 बजे भोपाल में फानी दुनिया को अलविदा कहा। उर्दू अदब की रूह में समाए बशीर बद्र तक़रीबन 14 बरस डिमेंशिया की गिरफ़्त में रहे, जिससे उनकी याददाश्त कमजोर होती चली गई, मगर उनके शेर आज भी दिलों में धड़कते हैं। उनको आज शाम 7:30 बजे भोपाल टॉकीज के पास कब्रिस्तान में सुपुर्दे खाक किया जाएगा।
उनकी पत्नी, डॉ. राहत बद्र, जब उनके शेर गुनगुनातीं, तो बशीर साहब के चेहरे पर शादाबी की हल्की सी झलक उभर आती थी। कभी-कभी वे ख़ुद भी मिसरा पूरा करने लगते। एक वक़्त था, जब उनके बिना मुशायरे अधूरे माने जाते थे। उनकी मौजूदगी महफ़िल की कामयाबी की ज़मानत हुआ करती थी। जब भी उन्हें मुशायरे की याद आती थी तो इरशाद, इरशाद कहने लगते थे।
बशीर बद्र के बारे में
जन्म: 15 फरवरी 1935, कानपुर, उत्तर प्रदेश
शिक्षा: बी.ए., एम.ए. और पीएच.डी. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU)
करियर: अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में लेक्चरर मेरठ कॉलेज में अध्यापन और विभागाध्यक्ष
प्रमुख सम्मान: पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार 1999, उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी सम्मान (4 बार) और बिहार उर्दू अकादमी सम्मान
साहित्यिक योगदान: 18,000+ शेर, 7+ उर्दू गजल और 1 हिंदी कविता संग्रह, 2 आलोचनात्मक पुस्तकें और रचनाएं-हिंदी, गुजराती और विदेशी भाषाओं में प्रकाशित।
शायरी में दर्द, मोहब्बत और ज़िंदगी की सच्चाई
डॉ. बद्र की शायरी में मोहब्बत का ख़ुलूस, ज़िंदगी की तल्ख़ी, शहरी भाग-दौड़ की बेचैनी और हिंदुस्तानी मिट्टी की ख़ुशबू मिलती है। उनके शेर सड़क से लेकर संसद तक गूंजते रहे हैं। उनकी ग़ज़लों ने देश-दुनिया में लोगों के दिलों को छुआ और ज़ुबानों पर चस्पा हो गए।
“कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता।”
यह महज़ एक शेर नहीं, बल्कि एक एहसास है जो हर धोखा खाए दिल की आवाज़ बन गया।
उनकी शायरी की तासीर देखिए-
“मेरी हंसी से उदासी के फूल खिलते हैं
मैं सबके साथ हूँ, लेकिन जुदा सा लगता हूँ।”
यही फन उन्हें सबसे अलग बनाता है। उन्होंने उर्दू ग़ज़ल को आम आदमी की ज़ुबान बख़्शी, उसे नए लहजे से नवाज़ा और नए अहसास दिए।



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