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Shailendra Singh
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बिहार में नीतीशे कुमार, महागठबंधन की करारी हार, इन प्वांइट्स से समझिए चुनाव में आखिर हुआ क्या?
नई दिल्ली/पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में जनादेश की बहार में जनता ने एक बार ‘नीतीशे कुमार’ पर भरोसा जताया। वे अपने स्वास्थ्य और नेतृत्व पर महागठबंधन की तरफ से उठते सवालों के बावजूद जनता की पसंद बने रहने में कामयाब हुए। वहीं, दूसरी ओर ‘तेजस्वी का प्रण’ काम नहीं आया। प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी भी बेअसर साबित हुई। अब हम जानते हैं कि आखिर नीतीश की इस बंपर जीत के मायने क्या हैं और महागठबंधन दल से आखिर गलती कहां पर हुई, जिससे जनता को उनका समर्थन नहीं मिल पाया?
नीतीश कुमार के नेतृत्व पर भरोसा
इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा रही नीतीश कुमार और उनके नेतृत्व की। भारत जैसे लोकतंत्र में हर चुनाव अहम है। सियासी रूप से सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में से एक बिहार की बात करें तो इस बार यहां चुनाव इसलिए खास रहे, क्योंकि यहां नीतीश कुमार लंबे समय से सत्ता में हैं। वे साल 2000 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कहने पर बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। बाद के वर्षों में उन्होंने गठबंधन बदले, लेकिन सत्ता उनके इर्द-गिर्द ही रही। अब तक वे कुल 09 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं और 2020 के बाद से ही वे तीन बार शपथ ले चुके थे।

अब 10वीं बार की तैयारी में हैं। इस बार उनकी पार्टी जनता दल-यूनाइटेड 101 सीटों पर चुनाव में उतरी थी। महागठबंधन शुरुआत में यह दबाव बनाने में कामयाब रहा कि नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया जा रहा है। लिहाजा, बीजेपी के बड़े नेताओं ने बार-बार यह कहकर नीतीश के नेतृत्व पर मुहर लगा दी कि जीत के बाद तो वे ही विधायक दल के नेता चुने जाएंगे।
बिहार में बंपर मतदान
बिहार में इस बार दो चरण में वोटिंग हुई। पहले चरण में 6 नवंबर को 18 जिलों की 121 सीटों पर मतदान हुआ। कुल 65.08 फीसदी वोट पड़े। दूसरे चरण में 20 जिलों की 122 सीटें पर मतदान हुआ। कुल 69.20 फीसदी वोट पड़े। इस तरह दोनों चरणों को मिलाकर देखा जाए, तो इस बार कुल मतदान 67.13 फीसदी मतदान हुआ। यह सिर्फ एक सामान्य आंकड़ा नहीं है, क्योंकि बिहार के अब तक के चुनाव इतिहास में इतना ज्यादा मतदान कभी नहीं हुआ।
चुनावी विश्लेषकों और चुनावी इतिहास के आंकड़ों पर गौर करें तो यह सामान्य धारणा मानी जाती है कि ज्यादा मतदान यानी या तो सत्ता विरोधी लहर है, या फिर सत्ताधारी पार्टी या गठबंधन के पक्ष में एकतरफा मतदान हुआ है। नतीजे भी कुछ इसी तरह आए हैं। जदयू को पिछली बार 15.39 फीसदी वोट मिले थे। इस बार उसे 18 फीसदी से ज्यादा वोट मिलते दिख रहे हैं यानी तीन फीसदी से ज्यादा का इजाफा जदयू के वोट बैंक में हुआ है। बढ़े हुए वोट प्रतिशत का नतीजों पर भी असर नजर आया। पिछले चुनाव में जदयू जहां तीसरे नंबर की पार्टी थी, इस बार उसे 30 से ज्यादा सीटों का फायदा हुआ है और वह राजद से भी आगे है।
महिलाओं के लिए योजना और फिर उनका मतदान
बिहार में नीतीश कुमार की जीत का बड़ा कारण महिलाएं मानी जाती रही हैं। लड़कियों को साइकिल देने से लेकर महिलाओं के खाते में सीधे 10 हजार रुपये भेजने तक की योजनाओं का नीतीश को फायदा होता रहा। इस बार चुनाव से ऐन पहले नीतीश कुमार ने करीब डेढ़ करोड़ महिलाओं के खाते में 10 हजार रुपये भेज दिए। इसे चुनाव का बड़ा गेमचेंजर माना गया। मतदान के दौरान इसका असर भी तब दिखाई दिया, जब दोनों ही चरणों में महिलाओं ने पुरुषों के मुकाबले बढ़-चढ़कर वोट डाला।
पुरुषों की तुलना में पहले चरण में 7.48 फीसदी और दूसरे चरण में 10.15 फीसदी अधिक महिलाओं ने वोट किया। सुपौल किशनगंज पूर्णिया कटिहार में 80 फीसदी से अधिक महिलाओं ने वोटिंग की। किशनगंज में सबसे अधिक 88.57 फीसदी महिलाओं ने वोट किया। बिहार के 38 जिलों में से 37 जिलों में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत ज्यादा रहा। सिर्फ पटना में पुरुषों ने महिलाओं से ज्यादा वोटिंग की।
बिखरा हुआ विपक्ष
पहले चरण के लिए नामांकन की अंतिम डेट तक महागठबंधन में सीटों के बंटवारे की स्थिति साफ नहीं थी। कई सीटों पर गठबंधन में शामिल दो-दो दलों के उम्मीदवार आमने-सामने थे। इस देरी का फायदा एनडीए को मिला, जहां महागठबंधन के मुकाबले काफी पहले सीट शेयरिंग हो चुकी थी। भाजपा और जदयू बराबरी से 101-101 सीटों पर चुनाव में उतरे थे। इस वजह से दोनों बड़े दलों में मतभेद की स्थिति नहीं थी।
वहीं, महागठबंधन ने अंत तक सीट शेयरिंग के बारे में औपचारिक ऐलान या आंकड़े नहीं बताए। महागठबंधन की एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस जरूर हुई, जिसमें तेजस्वी को मुख्यमंत्री पद का और वीआईपी के मुकेश सहनी को उपमुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किया गया। इसके बाद एनडीए ने जमकर इस बात को उछाला कि महागठबंधन ने किसी मुस्लिम और दलित चेहरे को डिप्टी सीएम पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है।
प्रधानमंत्री मोदी और नीतीश कुमार की छवि
एनडीए इस बात को स्थापित करने में कामयाब रहा कि डबल इंजन वाली सरकार ही बिहार में विकास को गति दे सकती है। इसमें एनडीए को सबसे बड़ी मदद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की छवि से मिली। एनडीए ने इन्हीं दो चेहरों को आगे रखकर चुनाव लड़ा। प्रधानमंत्री मोदी और चिराग पासवान की केमिस्ट्री की वजह से लोजपा (रामविलास) भी गठबंधन में मजबूती से खड़ी थी।

एनडीए वोटरों के बीच यह धारणा बनाने में कामयाब रहा कि बिहार की जनता अब जंगलराज की दोबारा वापसी नहीं चाहती और सुशासन चाहती है। लालू-राबड़ी की सरकार के कार्यकाल से ‘जंगलराज’ शब्द किस तरह जुड़ा है, इसका असर तेजस्वी के प्रचार में भी दिखा। पूरे प्रचार के दौरान राजद ने कहीं भी लालू या राबड़ी की तस्वीर का इस्तेमाल नहीं किया। पोस्टरों में अकेले तेजस्वी ही नजर आए।
राहुल गांधी ने फरवरी से पकड़ी अलग राह
वैसे, बिहार में इस हार के लिए तैयारी फरवरी में राहुल गांधी ने शुरू कर दी थी। उन्होंने बिहार आना शुरू किया। महागठबंधन के अंदर रहेंगे, यह कभी लगने ही नहीं दिया। लगा जैसे कि राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के कोर वोटरों को निशाना बनाने के लिए संगठन में फेरबदल कर रहे हैं। प्रदेश प्रभारी अल्लावरु को लाया गया। प्रदेश अध्यक्ष की कमान राजेश राम को दे दी गई।

महागठबंधन की जगह I.N.D.I.A. की तैयारी
देश स्तर पर विपक्षी दलों के गठबंधन की शुरुआत साल 2023 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने की थी। यह गठबंधन बन भी गया, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जनादेश 2020 की वापसी कराते हुए जनवरी, 2024 में एनडीए सरकार बनाकर उन बातों को भुला दिया। यह गठबंधन I.N.D.I.A. दिल्ली तक में फेल हुआ, लेकिन राहुल गांधी यहां राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन की जगह उसे लाने की कोशिश में कूद गए।
इसके लिए नए दलों को लाना था, जो कांग्रेस को नेतृत्व के लिए आगे बढ़ाते। लोकसभा चुनाव में राजद और तेजस्वी यादव ने महागठबंधन की कमान संभाली थी, लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव के लिए राहुल गांधी की तैयारी ही दूसरी थी।
चुनाव आयोग से लड़ाई, उसी पर समय भी दिया
जब भी चुनाव होता है, कुछ जीवित मतदाताओं के नाम गायब होने की खबर आती है और कुछ मृत का नाम वोटर लिस्ट में रहता ही है। लेकिन, बिहार में जब इन स्थितियों को सुधारने के लिए भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने मतदाताओं का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) कराना शुरू किया तो महागठबंधन के निशाने पर चुनाव आयोग आ गया। राहुल गांधी ने इस मुद्दे को बिहार में I.N.D.I.A. की एंट्री का रास्ता बनाने की कोशिश की।
राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने करीब डेढ़ महीने चुनाव आयोग से इस बात की लड़ाई में गुजार दिए। यह भी नहीं देखा कि आम जनता इसे कैसे देख रही है। प्रियंका गांधी ने जिसे वोटर लिस्ट में ‘भूत’ बताया, वह जिंदा मिली। जिसे राहुल गांधी ने वोटर लिस्ट से गायब बताया, वह भी वोटर लिस्ट में निकल आया। यह कुछ केस ही सामने आए। लेकिन, इसके लिए डेढ़ महीने का समय चुनाव आयोग को निशाना बनाने में लगाना महागठबंधन के नेताओं को भी नहीं पच रहा था। बस, आवाज नहीं उठ रही थी, क्योंकि राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने कमान संभाल रखी थी।
चुनाव का ऐलान हो गया, लेकिन सीटें नहीं बांट सके
लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव अपनी पाटी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेताओं को बगैर कांग्रेस से सीट बंटवारा हुए ही सिंबल बांटा था। राहुल गांधी ने फरवरी में सक्रियता दिखाते हुए बताया कि इस बार ऐसा नहीं होगा। कांग्रेस 243 में 75 से ज्यादा सीटें लेने की जिद पर अड़ी रही। इस कारण महागठबंधन में कई दलों को प्रवेश भी नहीं मिला।
पशुपति पारस, हेमंत सोरेन से लेकर असददुद्दीन ओवैसी तक की पार्टी कतार में रही, लेकिन महागठबंधन में पहले से रहे दलों में ही सीट बंटवारा नहीं हुआ। सीटों पर बंटवारा नहीं हुआ तो अंतत: राजद और फिर कांग्रेस ने भी एलान बगैर ही प्रत्याशियों को सिंबल देना शुरू कर दिया। अराजकता की स्थिति यह रही कि नामांकन के बाद भी सूची का ऐलान किया गया।
सीएम का चेहरा घोषित करने की जिद और मनमानी
महागठबंधन में राजद लगातार तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री का चेहरा बताता रहा, जबकि कांग्रेस ने मतदान से कुछ दिन पहले आकर इसे स्वीकार किया। डिप्टी सीएम के रूप में मुकेश सहनी का चेहरा घोषित करने की भी जिद ऐसी ही रही। इसी कारण यह मांग उठने लगी कि मुसलमान सिर्फ राजद-कांग्रेस को वोट देंगे और कुर्सी उन्हें नहीं मिलेगी! यह आवाज महागठबंधन ने दबा दी।

अगर घोटाले में आरोपित होने और NDA की ओर से जंगलराज का मुद्दा उठाए जाने के कारण कांग्रेस तेजस्वी यादव के चेहरे पर मुहर नहीं लगाना चाहती थी तो इसपर बात कर बीच का रास्ता निकाला जा सकता था। लेकिन, सभी अपनी-अपनी जिद पर रहे। यहां तक कि घोषणापत्र भी कई बार आए। अधितकर बार तेजस्वी अकेले लेकर आए और एक बार कांग्रेस के साथ।
नीतीश के अलावा इन चेहरों पर थी नजर
पहला चेहरा- तेजस्वी यादव
लालू प्रसाद यादव भले ही राजद सुप्रीमो हैं, लेकिन अब पार्टी का चेहरा तेजस्वी यादव ही हैं। नीतीश सरकार के साथ कुछ महीनों की सरकार के दौरान तेजस्वी उप मुख्यमंत्री रहे। उनके कार्यकाल के दौरान जो सरकारी भर्तियां हुईं, इस बार राजद ने उसे ही सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया।
दूसरा चेहरा- प्रशांत किशोर
प्रशांत किशोर की पार्टी जनसुराज का इस चुनाव में पदार्पण हुआ। वे चुनावी मैदान में नहीं उतरे, लेकिन उन्होंने एनडीए और महागठबंधन से अलग दिखने और राज्य के बुनियादी मुद्दों को छूने का प्रयास। यह माना गया कि इस बार उनकी पार्टी कुछ सीटों पर जीत की स्थिति में आ सकती है या कई सीटों पर एनडीए अथवा महागठबंधन के प्रत्याशियों के वोट काटकर खेल बिगाड़ सकती है। हालांकि, रुझानों से यह साफ है कि जनसुराज अपने पहले टेस्ट में कोई करिश्मा नहीं कर पाई।



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