SRMS मेडिकल कॉलेज में वर्कशॉप, देव मूर्ति बोले- कम खर्च पर मेडिकल सुविधा देने का प्रयास
- एसजीपीजीआई के न्यूरो सर्जन डॉ. अवधेश जायसवाल ने लाइव ऑपरेशन से दी जानकारी
बरेली: मरीजों और उनके तीमारदारों को इलाज के बेवजह के खर्चों से मुक्ति दिलाना और अपने ही शहर में सर्वश्रेष्ठ उपचार देकर स्वस्थ करना एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज का प्रयास रहा है। उपचार में सर्जन के साथ ही दूसरे विभागों का समन्वय और पूरी टीम की जरूरत होती है। इसी को ध्यान में रखते हुए यहां के सभी सुपरस्पेशियलिटी और अन्य विभाग एक साथ काम कर रहे हैं।
यह बात एसआरएमएस ट्रस्ट के संस्थापक एवं चेयरमैन देव मूर्ति ने एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज में ‘ब्रेन ट्यूमर का शीघ्र निदान और उपचार’ विषय पर आयोजित वर्कशॉप के उद्घाटन समारोह में कही। समारोह में ऑपरेशन के बाद ब्रेन ट्यूमर से मुक्ति पाने वाले मरीजों ने ब्रेन ट्यूमर से न घबराने की सलाह दी और लोगों को जागरूक किया। इस दौरान एसआरएमएस ट्रस्ट के चेयरमैन देव मूर्ति ने ठीक हुए मरीजों को सम्मानित कर उन्हें बधाई दी।
एंडोस्कोपिक विधि से ‘पिट्यूटरी एडेनोमा डीकंप्रेशन सर्जरी’
एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज के न्यूरो सर्जरी विभाग की ओर से रविवार को आयोजित इस वर्कशॉप का शुभारंभ सरस्वती वंदना और दीप प्रज्वलन से हुआ। वर्कशॉप में एसजीपीजीआई लखनऊ के न्यूरो सर्जन डॉ. अवधेश जायसवाल ने अपनी टीम के डॉ. अभिषेक शुक्ला और डॉ. विकास विश्वकर्मा के साथ मिलकर पिट्यूटरी ग्रंथि में हुए नॉन-कैंसर ट्यूमर के दबाव को कम करने के लिए एंडोस्कोपिक विधि से ‘पिट्यूटरी एडेनोमा डीकंप्रेशन सर्जरी’ की और लाइव प्रसारण के जरिए इसके संबंध में विस्तृत जानकारी दी।

डॉ. जायसवाल ने बताया कि पिट्यूटरी ग्रंथि में ट्यूमर बड़ा होने पर आसपास की ऑप्टिक नसों पर दबाव डालता है, जिससे दृष्टि हानि, धुंधलापन और सिरदर्द जैसी गंभीर समस्याएं होती हैं। उन्होंने सलाह दी कि ब्रेन ट्यूमर लाइलाज नहीं है। आज एडवांस टेक्नोलॉजी से समय पर पता चलने पर कैंसरयुक्त ट्यूमर का भी बिना रेडिएशन और कीमोथेरेपी के पूरी तरह उपचार संभव है, बस इसके लक्षणों की अनदेखी न करें।
ब्रेन ट्यूमर के प्रति जागरूकता जरूरी
उद्घाटन समारोह में सभी का स्वागत करते हुए एसआरएमएस के सर्जन डॉ. शशांक शाह ने कहा कि विश्व ब्रेन ट्यूमर दिवस पर इसके प्रति जागरूकता बेहद जरूरी है। उन्होंने इतिहास का जिक्र करते हुए बताया कि पहली बार ब्रेन ट्यूमर का सफल ऑपरेशन करीब डेढ़ सौ साल पहले 27 जुलाई, 1879 में स्कॉटलैंड के सर्जन डॉ. विलियम मैकेवेन ने बिना किसी अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी के किया था। अब तो हमारे पास आधुनिक तकनीकें मौजूद हैं, इसलिए घबराने की जरूरत नहीं है।
उन्होंने कहा कि मरीज जितनी जल्दी न्यूरो सर्जन के पास जाता है, उसका स्वस्थ होना उतना ही आसान होता है। इसके इलाज में न्यूरो सर्जन के साथ रेडियोलाजिस्ट, एनेस्थेसिएसिस्ट और ओंकोलाजिस्ट की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है, इसलिए मरीज को ऐसे संस्थान में जाना चाहिए जहां ये सभी विभाग एक साथ उपलब्ध हों।
कार्यक्रम में इनकी रही मौजूदगी
कार्यक्रम में आए सभी अतिथियों का स्वागत न्यूरो सर्जरी विभाग के एचओडी प्रोफेसर (डॉ.) केएम झा ने किया और अंत में डॉ. प्रवीण त्रिपाठी ने धन्यवाद प्रस्ताव रखा। पूरे कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. अनु त्यागी द्वारा किया गया। इस महत्वपूर्ण शैक्षणिक और चिकित्सा वर्कशॉप के दौरान एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज के डायरेक्टर आदित्य मूर्ति, प्रिंसिपल एयर मार्शल (सेवानिवृत्त) डॉ. एमएस बुटोला, मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. आरपी सिंह, डॉ. शरत जौहरी, डीन पीजी डॉ. एसके सागर, डॉ. आरके महाजन, डॉ. सुधीर गुप्ता, डॉ. सतीश कुमार, डॉ. अमित खन्ना, डॉ. कमल जिंदल, डॉ. मनीष गुप्ता सहित सभी विभागों के विभागाध्यक्ष और चिकित्सक मुख्य रूप से मौजूद रहे।



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