तेल अवीव/तेहरान: अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच जारी जंग का बुधवार (11 मार्च) को 12वां दिन है। इस संघर्ष में अब तक 140 अमेरिकी सैनिक घायल हो चुके हैं, जबकि 7 सैनिकों की मौत की पुष्टि हुई है। उधर, ईरान का कहना है कि उसके देश में हुए हमलों में करीब 8000 घरों को नुकसान पहुंचा है और 1300 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।
संयुक्त राष्ट्र (UN) में ईरान के राजदूत अमीर सईद इरावानी के मुताबिक देश में करीब 9600 सिविलियन इलाकों को निशाना बनाया गया। इनमें घरों के अलावा बाजार, अस्पताल, मेडिसिन सेंटर्स और स्कूल भी शामिल हैं। इस बीच ईरान ने यह भी दावा किया है कि उसने इजराइल के कई शहरों पर मिसाइल हमले किए हैं। ईरान के मुताबिक हाइफा, यरुशलम और तेल अवीव को निशाना बनाया गया।
ईरान की मदद क्यों नहीं कर रहे हूती विद्रोही
इजराइल और अमेरिका के ईरान पर हमले के बाद पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव फैल गया है। इस जंग में ईरान, इजराइल,सऊदी, लेबनान, UAE जैसे मिडिल ईस्ट के कुल 12 देश शामिल हो चुके हैं। हालांकि जंग के 9 दिन बीत जाने के बाद भी अब तक यमन इससे दूर है। यमन में हूती विद्रोही रहते हैं जो कि ईरान के सहयोगी माने जाते हैं। अक्टूबर 2023 में गाजा जंग शुरू होने के बाद कई बार इजराइल और हूती विद्रोही एक-दूसरे पर हमला कर चुके हैं।
पिछले साल जून में इजराइल और ईरान के बीच 12 दिन जंग चली थी, तब भी हूती विद्रोही इस जंग में शामिल थे। हालांकि, इस बार 28 फरवरी से जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमले शुरू किए, तब से अब तक हूती विद्रोहियों ने ईरान का समर्थन केवल बयानों के जरिए ही किया है। हालांकि यह साफ नहीं है कि वे आगे भी इस जंग से दूर रहेंगे या नहीं।
अमेरिकी सांसद बोले– ट्रम्प का ईरान जंग से जुड़ा प्लान क्लियर नहीं
अमेरिकी सांसद क्रिस मर्फी ने कहा है कि ट्रम्प सरकार की ईरान जंग से जुड़ी प्लानिंग साफ और पूरी तरह तैयार नहीं लगती। उन्हें डर है कि यह लड़ाई आगे चलकर बहुत लंबी और अंतहीन जंग बन सकती है। मर्फी ने यह बात कैपिटल हिल में हुई करीब दो घंटे की सीक्रेट ब्रीफिंग के बाद कही। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि सरकार इस जंग पर खुलकर बात नहीं कर रही, इसलिए सारी जानकारी बंद कमरे में दी जा रही है।
उन्होंने कहा कि वह सीक्रेट जानकारी शेयर नहीं कर सकते, लेकिन ब्रीफिंग से यह पता चला कि इस जंग का मेन टारगेट ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करना नहीं है। यह बात उन्हें हैरान करने वाली लगी, क्योंकि ट्रम्प कई बार इसे बड़ा टारगेट बता चुके हैं। मर्फी ने यह भी कहा कि ईरान की सरकार बदलना भी अमेरिका के मुख्य टारगेट में शामिल नहीं है। उनका कहना है कि अगर ऐसा है तो अमेरिका इस युद्ध में बहुत पैसा खर्च करेगा और जान का नुकसान भी हो सकता है, लेकिन आखिर में ईरान में वही सख्त सरकार बनी रह सकती है।
खाड़ी देश न्यूक्लियर आपदा से बचाव की तैयारी कर रहे
अमेरिका-ईरान जंग के बीच खाड़ी देशों ने न्यूक्लियर डिजास्टर से बचने की तैयारी शुरू कर दी है। इसी वजह से बहरीन की एक एजेंसी ने चंडीगढ़ की एक दवा कंपनी से संपर्क किया है। एजेंसी ने कंपनी से पूछा है कि क्या वह न्यूक्लियर इमरजेंसी में काम आने वाली ‘प्रुशियन ब्लू’ कैप्सूल बड़ी मात्रा में बना सकती है। जानकारी के मुताबिक, उनसे करीब 1 करोड़ कैप्सूल बनाने की क्षमता के बारे में पूछा गया है। साथ ही यह भी पूछा गया है कि अलग-अलग उम्र के लोगों को इसकी कितनी डोज देनी होगी।
यह दवा शरीर में पहुंचे रेडियोएक्टिव (रेडिएशन वाले) तत्वों के असर को कम करती है। ये तत्व शरीर में चले जाएं तो यह कैप्सूल उन्हें आंतों में बांधकर मल के जरिए बाहर निकालने में मदद करती है। पहले यह दवा ज्यादा तर अमेरिका और यूरोप में बनती थी, लेकिन भारत में इसका कमर्शियल प्रोडक्शन करीब दो साल पहले शुरू हुआ है। अगर यह डील तय हो जाती है तो यह दवा बहरीन, कुवैत, कतर और जॉर्डन जैसे खाड़ी देशों को भेजी जा सकती है।
ईरान जंग से थाईलैंड में लिफ्ट के इस्तेमाल पर रोक
ईरान जंग का असर अब एशिया के कई देशों में दिखाई देने लगा है। तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित होने के कारण कम से कम 9 एशियाई देशों में ऊर्जा संकट गहराने लगा है। हालात ऐसे हैं कि अलग-अलग देशों को ईंधन बचाने और ऊर्जा संकट से निपटने के लिए सख्त कदम उठाने पड़े हैं। थाईलैंड ने सरकारी दफ्तरों में लिफ्ट के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है और कर्मचारियों को सीढ़ियों का इस्तेमाल करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही कर्मचारियों को सूट-टाई जैसे औपचारिक कपड़े पहनने से भी मना किया गया है, ताकि एयर कंडीशनर के इस्तेमाल को कम किया जा सके।
दूसरी ओर पाकिस्तान में खर्च कम करने के लिए मंत्रियों की सैलरी और विदेश यात्राओं पर रोक लगा दी गई है, साथ ही सरकारी खर्च और ईंधन उपयोग में कटौती के फैसले लिए गए हैं।