रिद्धिमा में मुशायरे की शाम ‘बज़्म-ए-सुखन’ का आयोजन

रिद्धिमा में मुशायरे की शाम 'बज़्म-ए-सुखन' का आयोजन

बरेली: एसआरएमएस रिद्धिमा के सभागार में गुरुवार शाम मुशायरे की शाम ‘बज़्म-ए-सुखन’ का आयोजन हुआ। इसमें शायर इमरान सैदपुरी, अलीगढ़ की शयरा तस्लीम बानो, बदायूं के सरवत परवेज़ सहसवानी, बरेली के मिर्ज़ा मख़दूम बेग बरेलवी और बदायूं के सुरेन्द्र नाज़ बदायुंनी ने अपने कलाम से श्रोताओं को रोमांचित किया। ‘बज़्म ए सुखन’ का आगाज इमरान सैदपुरी ने किया। उन्होंने अपना कलाम पढ़ा, बोले- ‘जिसने की सीधी जूतियाँ मेरी, वो गिनाता है खामियां मेरी। जिनको नीलाम कर चुका मैं, वो लगाते हैं बोलियां मेरी’।

शायर सुरेन्द्र नाज़ बदायुंनी ने कहा, ‘पत्ता- पत्ता बिछड़ रहा हूँ मैं, रफ़्ता- रफ़्ता उजड़ रहा हूँ मैं। कल मुझे इम्तिहान देना है, आज रिश्तों को पढ़ रहा हूं मैं। शायरा तस्लीम बानो ने कहा- ‘बस अजनबी ही ना हुए इक साथ रहने से, इतने बढ़े थे शिकवे कि रिश्ता अजीब था। जब जख्म भर गए मुझे वीरान कर गए, ऐसी ख़ला थी कुछ भी न खलना अजीब था।’ शायर सरवत परवेज़ सहसवानी ने अपने कलाम ‘है तक़ाज़ा प्यार के सांचे में ढल कर आइए, दोस्ती की राह में कुछ दूर चलकर आइए। है बड़ा पुरकैफ़ मंज़र इस जहां में चारसू, कुंद ज़हनों से ज़रा बाहर निकाल कर आइए’ से दोस्ती और इश्क को उजागर किया।

रिद्धिमा में मुशायरे की शाम 'बज़्म-ए-सुखन' का आयोजन

फरदीन अहमद ने की कार्यक्रम की निजामत

शायर मिर्ज़ा मख़दूम बेग बरेलवी ने ‘तूफ़ान के आने का कोई डर नहीं होता, दरिया के किनारे जो मेरा घर नहीं होता, या प्यास न होती मिरे बेचैन लबों पर, या सामने आंखो के समन्दर नहीं होता’ सुनाकर जीवन दर्शन को उजागर किया। कार्यक्रम में उपस्थित शायर डॉ. संजीव श्रीवास्तव ने अपने शेर ‘कहां जाएगा तू ओ बेताब परवाने, तेरी आहट से ही शम्मा घबरा गई है’ से इश्क की दीवानगी की व्याख्या की। कार्यक्रम की निजामत फरदीन अहमद खान ने की। उन्होंने ‘खुशबू है इसमें आपके दस्त ए करीम की, कैसे भला ये पीठ का खंजर निकाल दूं’ सुनाकर श्रोताओं की वाहवाही हासिल की।

इस अवसर पर एसआरएमएस ट्रस्ट के संस्थापक एवं चेयरमैन देव मूर्ति, डॉ. एमएस बुटोला, डॉ. प्रभाकर गुप्ता, डॉ. अनुज कुमार, डॉ. शैलेश सक्सेना, डॉ. रीता शर्मा और शहर के गण्यमान्य लोग मौजूद रहे।

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