Important! ईंधन की कमी पर पैनिक बिहेवियर, ये लोगों की सतर्कता या साइकोलॉजिकल कंडीशन?

Important! ईंधन की कमी पर पैनिक बिहेवियर, ये लोगों की सतर्कता या साइकोलॉजिकल कंडीशन?
  • -अचानक आए पैनिक बिहेवियर पर क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. आस्था शर्मा से खास बातचीत

लखनऊ: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और देश में पेट्रोल-डीज़ल व रसोई गैस की संभावित किल्लत की चर्चाओं ने आम नागरिकों के मन में अनिश्चितता, डर और बेचैनी का वातावरण बना दिया है। सोशल मीडिया पर प्रसारित संदेश, अपुष्ट दावे और आधी-अधूरी सूचनाएं लोगों को इस हद तक प्रभावित कर रही हैं कि कई लोग ईंधन और गैस का अनावश्यक भंडारण करने की योजना तक बनाने लगे हैं। यह महज़ सतर्कता है या मनोवैज्ञानिक पैनिक? व्यक्तिगत आशंका है या सामूहिक मानसिक स्थिति? इन्हीं प्रश्नों पर लखनऊ की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. आस्था शर्मा  से बातचीत की गई। पढ़िए इस बातचीत के प्रमुख अंश…

मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता ही है इसका पहला इलाज
क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. आस्था शर्मा

 

सवाल: संभावित कमी की खबर मिलते ही लोगों में किस तरह का पैनिक बिहेवियर जन्म लेता है?

जवाब: किसी जरूरी संसाधन, जैसे ईंधन या गैस की कमी की खबर दिमाग उसे तत्काल खतरे के रूप में दर्ज करता है। यह स्थिति व्यक्ति को “सर्वाइवल मोड” में ले जाती है। मानव मस्तिष्क का विकास जीवन-रक्षा की प्रवृत्ति के साथ हुआ है, इसलिए ऐसी परिस्थितियों में “फाइट या फ्लाइट” प्रतिक्रिया सक्रिय हो जाती है। व्यक्ति तर्क से अधिक प्रतिक्रिया में सोचने लगता है। उसे लगता है कि यदि अभी संसाधन नहीं जुटाए, तो बाद में उपलब्ध नहीं होंगे। यही सोच पैनिक को जन्म देती है। परिणामस्वरूप लोग जरूरत से ज्यादा भरवा लेते हैं, कतारों में लग जाते हैं और अनजाने में उसी संकट को बढ़ाने लगते हैं, जिससे वे बचना चाहते हैं। इसे अभाव-जनित भय भी कहा जा सकता है।

 

सवाल: सोशल मीडिया और अफवाहें इस डर को किस तरह बढ़ाती हैं?

जवाब: सोशल मीडिया आज केवल सूचना नहीं, भावना भी प्रसारित करता है। जब कोई व्यक्ति डर के साथ संदेश साझा करता है, तो वह अपना भय भी दूसरों तक पहुंचाता है। देखते-देखते व्यक्तिगत डर सामूहिक मनोदशा में बदल जाता है। मनोविज्ञान में इसे “मास हिस्टीरिया” या “कलेक्टिव एंग्जायटी” कहा जाता है। बार-बार दिखने वाली सामग्री को दिमाग सत्य मानने लगता है, भले ही वह अपुष्ट या भ्रामक हो।

 

सवाल: लोग अनावश्यक भंडारण की ओर क्यों बढ़ते हैं?

जवाब: जब व्यक्ति को लगता है कि परिस्थितियों पर उसका नियंत्रण नहीं है, तो वह छोटी-छोटी चीजों पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश करता है, जैसे भंडारण। इससे उसे मानसिक संतोष मिलता है कि उसने तैयारी कर ली है। लेकिन यही व्यवहार सामूहिक स्तर पर समस्या को और गंभीर कर देता है।

 

सवाल: ऐसी स्थिति में नागरिक अपने मानसिक संतुलन को कैसे बनाए रखें?

जवाब: हर फॉरवर्ड संदेश सच नहीं होता। आधिकारिक स्रोतों पर भरोसा करें। घर में भय की भाषा का प्रयोग न करें, खासकर बच्चों के सामने। बच्चे वातावरण से अधिक सीखते हैं, शब्दों से कम। यदि घर में लगातार संकट की चर्चा होगी, तो बच्चों में असुरक्षा की भावना घर कर सकती है। सामान्य दिनचर्या बनाए रखना, अफवाहों पर चर्चा से बचना और सकारात्मक संवाद बनाए रखना मानसिक संतुलन के लिए आवश्यक है। मानसिक स्थिरता भी एक सामाजिक जिम्मेदारी है।

 

सवाल: सरकार, मीडिया और समाज, तीनों की भूमिका भरोसा और संयम बनाए रखने में क्या होनी चाहिए?

जवाब: सरकार को समय पर, स्पष्ट और भरोसेमंद जानकारी देनी चाहिए। मीडिया को सनसनी से बचते हुए तथ्यों को प्राथमिकता देनी चाहिए। समाज की जिम्मेदारी है कि वह अपुष्ट सूचनाओं को आगे न बढ़ाए। जब ये तीनों पक्ष संतुलित ढंग से काम करते हैं, तो डर की जगह भरोसा पनपता है और पैनिक की गुंजाइश स्वतः कम हो जाती है।

साफ है कि कई बार वास्तविक संकट से पहले मानसिक संकट जन्म ले लेता है। अफवाहें आग का काम करती हैं और पैनिक उस आग में घी का। ऐसे समय में संयम, विवेक और जिम्मेदार व्यवहार ही सबसे प्रभावी उपाय हैं। क्योंकि हर संकट पहले बाहर नहीं, हमारे मन के भीतर आकार लेता है और वहीं संभाला भी जा सकता है।

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