बरेली: एसआरएमएस रिद्धिमा के सभागार में गुरुवार को मुशायरा बज्म-ए-सुखन आयोजित हुआ। इसमें बरेली के शायर इस्तखार अहमद नाज़ुक, यहीं के कामिल हुसैन रिज़वी, बदायूं के शायर डॉ. सैयद इमरान अली रिज़वी, अलीगढ़ की शायरा तस्लीम बानो, अलीगढ़, बदायूं के मुहम्मद शमसुद्दीन शम्स, बरेली के सरवत परवेज ने अपने नज़्मों और कलाम श्रोताओं की वाहवाही हासिल की। शायर इस्तखार अहमद नाज़ुक ने अपना कलाम ‘यूं ही अपना मिलाप थोड़ी है, यह कहानी लिखी हुई होगी’ सुनाया।
शायर कामिल हुसैन रिज़वी ने ‘कैद करने के भी हकदार नहीं हैं वो लोग, रहम खाने को भी तैयार नहीं हैं वो लोग’ और ‘रास्ता रोकेंगे फिर भी मुझे जाने देंगे, दोस्त हैं आहानी दीवार नहीं हैं वो लोग’ सुनाकर श्रोताओं की तालियां हासिल की। शायर डॉ. सैयद इमरान अली रिज़वी ने ‘कोई समझे तो बात का मतलब, बात मतलब की सब समझते हैं’ सुनाया। तस्लीम बानो ने अपना कलाम ‘खौफे तन्हाई में आकर किसी के हो जाते हैं, लोग इतने तन्हा हैं की सभी के हो जाते हैं’ और ‘हम किसी के हो नहीं सकते हमें लगता है ये, जो बदलता है कोई हम उसी के हो जाते हैं’ पढ़ा।

महफिल में तालियों की गूंज
मुहम्मद शमसुद्दीन शम्स ने ‘दो भाई पड़ोसी में तब्दील किए जिसने, आंगन की मुझे अब वो दीवार गिराना है’ और ‘खाई है कसम मैने है जिस्म में जां जब तक, रोतों को हंसाना है गिरतों को उठाना है’ और ‘कितनी ही बुलंदी पे यह “शम्स” पहुंच जाए, मगरिब में इसे आखिर ख़ुद डूब ही जाना है’ पढ़ा। सरवत परवेज ने ‘अपनी दुनिया तमाम कर बैठे, जिंदगी तेरे नाम कर बैठे, जो मिला वो मेरा मुकद्दर था, फैसला अपने नाम कर बैठे’, दिल दुखाने की बात मत करना, भूल जाने की बात मत करना, इस चमन को जला दिया तुमने, अब सजाने की बात मत करना’ सुना कर महफ़िल की तालियां हासिल कीं।
मुशायरे का संचालन फरदीन अहमद ने किया। इस मौके पर एसआरएमएस ट्रस्ट के संस्थापक एवं चैयरमेन देव मूर्ति, डॉ. प्रभाकर गुप्ता, डॉ. अनुज कुमार, डॉ. शैलेश सक्सेना, डॉ. रीता शर्मा मौजूद रहे।