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मुंह में 32 दांत, अब हो जाएगी पुरानी बात

मुंह में 32 दांत, अब हो जाएगी पुरानी बात
  • खानपान की बदलती आदतों की वजह से अक्ल दाढ़ के बिना जियेगी नई पीढ़ी

बरेली: आपने अपने पूरे परिवार के साथ बैठकर गन्ना कब चूसा? अच्छा, यह बताइए कि आप बच्चों के साथ हफ्ते में एक दो बार भुने चने चबाते हैं या नहीं? अगर आप ऐसा नहीं करते तो आपके बच्चे सारी जिंदगी बिना अक्लदाड़ के जिएंगे। हमारी बदलती आदतों और आरामतलबी ने बच्चों के जबड़ों का आकार छोटा कर दिया है। हाल के दशकों में दंत चिकित्सकों और वैज्ञानिकों ने देखा है कि बच्चों में अक्ल दाढ़ (Third Molars) के न उगने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।  यानी नई पीढ़ी के मुंह में 28 या 30 दांत ही होंगे। 32 दांतों वाला इंसानी जबड़ा अगले कुछ बरसों में इतिहास बन जाएगा।

इंसान के मुंह में अब तक कुल 32 दांत होते हैं। इनमें कृंतक (Incisors) इनकी संख्या आठ होती है, जो भोजन को काटने का काम करते हैं। रदनक (Canines) इनकी संख्या चार होती है, यह भोजन को फाड़ने का काम करते हैं। अग्रचर्वणक (Premolars) की संख्या आठ होती है, यह भोजन को ठीक से चबाते हैं। चर्वणक (Molars) की संख्या 12 होती है, यह भोजन को पीसने का काम करते हैं। 12 मोलर दांतों में से सबसे पीछे आने वाले चार दांतों को अक्लदाड़ कहते हैं। ये दांत सामान्यत: किशोरावस्था के बाद निकलते हैं।

विकासवादी दृष्टिकोण ने छोटा कर दिया जबड़ा

मानव का विकास ‘नेचुरल सिलेक्शन’ के सिद्धांतों पर आधारित है। हमारे पूर्वजों के जबड़े बड़े और मजबूत थे, क्योंकि उन्हें कच्चा मांस, जड़ें और कठोर रेशेदार भोजन चबाना पड़ता था। जब से मानव ने भोजन को पकाकर और नरम करके खाना शुरू किया, भारी जबड़ों की आवश्यकता कम हो गई। जैसे-जैसे मानव मस्तिष्क का आकार बढ़ा, खोपड़ी में जबड़े के लिए जगह कम होती गई। इसके परिणामस्वरूप, जबड़े छोटे (Narrower Jaws) होते गए।

छोटे जबड़ों पर अब तक हुए प्रमुख शोध

1. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी और डॉ. पॉल एर्लिच का शोध (The Jaws Epidemic)

डॉ. पॉल एर्लिच और सैंड्रा कान ने अपनी पुस्तक और शोध Jaws: The Story of a Hidden Epidemic में तर्क दिया है कि आधुनिक मानव का जबड़ा ‘संकुचित’ (Narrow) होता जा रहा है। वह समझाते हैं कि लाखों वर्षों तक मानव पूर्वजों ने कठोर, रेशेदार और कच्चा भोजन किया। इस प्रक्रिया में जबड़े की हड्डियों और मांसपेशियों पर भारी दबाव पड़ता था, जिससे वे चौड़े और मजबूत विकसित होते थे। 32 दांतों के लिए तब पर्याप्त जगह (Space) उपलब्ध थी। मगर, औद्योगिक क्रांति के बाद हमने ‘नरम भोजन’ (Processed Food) अपना लिया।

डॉ. एर्लिच के अनुसार, जब बच्चा विकसित होता है तो उसके जबड़े को बढ़ने के लिए ‘मैस्टिकेशन’ (चबाने के व्यायाम) की आवश्यकता होती है। चूंकि, आधुनिक बच्चे दलिया, प्यूरी और नरम ब्रेड खाते हैं, जिससे उनके जबड़े पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते। परिणाम स्वरूप, जबड़े छोटे रह जाते हैं और अक्ल दाढ़ (Wisdom Teeth) के लिए जगह नहीं बचती। इसी कारण शरीर अब आनुवंशिक रूप से इन दांतों को ‘डिलीट’ करने की प्रक्रिया में है। उनका मानना है कि यह कोई अचानक हुआ बदलाव नहीं है, बल्कि पिछली 200-300 वर्षों की जीवनशैली का परिणाम है।

मुंह में 32 दांत, अब हो जाएगी पुरानी बात

2. अक्ल दाढ़ का गायब होना (Molar Agenesis Research)

Molar Agenesis and Human Evolution जैसे शोध पत्रों में इस बात का सांख्यिकीय विश्लेषण किया गया है कि दुनिया की आबादी में दांतों की संख्या कैसे घट रही है। इस शोध के अनुसार, हाइपोडॉन्टिया (Hypodontia), एक ऐसी स्थिति जहां एक या अधिक दांत गायब होते हैं, अब दुर्लभ नहीं रही। शोधकर्ताओं ने पाया है कि मानव जीनोम में सूक्ष्म परिवर्तन हो रहे हैं। विशेष रूप से, अक्ल दाढ़ (Third Molars) अब एक ‘अवशेषी अंग’ (Vestigial Organ) बन चुके हैं, जैसे कि शरीर की ‘अपेंडिक्स’। वैज्ञानिकों ने विभिन्न समुदायों का अध्ययन किया और पाया कि कुछ स्वदेशी जनजातियों में, जो अभी भी पारंपरिक आहार लेती हैं, लगभग सभी के 32 दांत होते हैं।

इसके विपरीत, शहरी क्षेत्रों में पैदा होने वाले बच्चों में अक्ल दाढ़ के ‘बड्स’ (Buds) ही नहीं बन रहे हैं। यह शोध यह भी बताता है कि भविष्य में हमारे लेटरल इंसिज़र्स (सामने के छोटे दांत) भी गायब हो सकते हैं, जिससे मानव का चेहरा और भी ‘स्मूथ’ और ‘फ्लैट’ दिखेगा। यह विकासवादी प्रक्रिया का एक हिस्सा है, जिसे ‘इकोनॉमी ऑफ नेचर’ कहा जाता है, जो अंग काम का नहीं, शरीर उस पर ऊर्जा खर्च करना बंद कर देता है।

भारत में भी बढ़ रही ऐसे बच्चों की संख्या

भारत में पिछले तीन दशकों में खान-पान की आदतों में जो बदलाव आया है, वह दांतों की संरचना बदलने का सबसे बड़ा ‘पर्यावरणीय कारक’ (Environmental Factor) है। ऐतिहासिक रूप से, भारतीय आहार में रेशेदार सब्जियां, मोटे अनाज (बाजरा, ज्वार) और गन्ना जैसी कठोर चीजें शामिल थीं, जिन्हें चबाने के लिए ‘मैस्टिकेटरी मसल्स’ (चबाने वाली मांसपेशियों) का अत्यधिक उपयोग होता था। व्यायाम की तरह, यह दबाव जबड़े की हड्डी को चौड़ा और मजबूत बनाता था। मगर, आधुनिक भारतीय शहरी जीवनशैली में ‘अल्ट्रा-प्रोसेस्ड’ और ‘सॉफ्ट डाइट’ (मैदा, सॉफ्ट ब्रेड, पनीर, प्यूरी आधारित भोजन) का बोलबाला हो गया है।

रुहेलखंड मेडिकल कॉलेज की डॉक्टर शिवांगी शर्मा ने बताया कि जब भारतीय बच्चे बचपन में कठोर भोजन नहीं चबाते, तो उनके ‘डेंटो-एल्विओलर’ (Dento-alveolar) विकास में कमी रह जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि जबड़ा ‘U-शेप’ के बजाय ‘V-शेप’ (Narrow) होने लगता है। जब जबड़ा संकुचित हो जाता है, तो अंतिम दांतों यानी ‘अक्ल दाढ़’ (Wisdom Teeth) के लिए जगह ही नहीं बचती। प्रकृति इस विसंगति को दूर करने के लिए ‘नेचुरल सिलेक्शन’ का सहारा ले रही है। जिन बच्चों के जीन में अक्ल दाढ़ न बनाने का निर्देश है, उन्हें जबड़े के दर्द या दांतों के फंसने (Impaction) की समस्या नहीं होती, जिससे वे विकासवादी रूप से अधिक फिट माने जाते हैं। यही कारण है कि भारतीय महानगरों में 30 दांतों वाले बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

मुंह में 32 दांत, अब हो जाएगी पुरानी बात

डॉक्टर शिवांगी शर्मा, रुहेलखंड मेडिकल कॉलेज

भारतीय आबादी में आनुवंशिक म्यूटेशन भी बड़ी वजह

भारत की विशाल और विविध आबादी आनुवंशिक शोधों के लिए एक प्रयोगशाला की तरह है। यहां दांतों के गायब होने (Hypodontia) को केवल एक शारीरिक कमी नहीं, बल्कि एक ‘जेनेटिक शिफ्ट’ के रूप में देखा जा रहा है। भारतीय दंत संस्थानों (जैसे- AIIMS और सरकारी दंत महाविद्यालयों) के शोध पत्रों में PAX9 और MSX1 जीन के म्यूटेशन पर विशेष चर्चा की गई है। शोध बताते हैं कि भारतीय जनसंख्या के एक बड़े हिस्से में ये जीन अब ‘साइलेंट’ या ‘म्यूटेटेड’ हो रहे हैं। विशेष रूप से अक्ल दाढ़ और ‘लैटरल इंसिज़र्स’ (सामने के छोटे दांत) के मामले में यह म्यूटेशन सबसे अधिक प्रभावी है।

रुहेलखंड डेंटल कॉलेज की डॉक्टर पल्लवी वशिष्ठ ने बताया कि कि भारतीय युवाओं में 30 दांत (दो अक्ल दाढ़ों की कमी) होना अब एक ‘नया सामान्य’ (New Normal) बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह भारत में बढ़ते ‘अर्बनाइजेशन’ (शहरीकरण) का परिणाम है। दिलचस्प बात यह है कि ग्रामीण भारत की तुलना में शहरी भारत में दांतों के गायब होने की दर 3.5 गुना अधिक पाई गई है। यह स्पष्ट करता है कि जैसे-जैसे हमारी जीवनशैली बदल रही है, हमारा डीएनए (DNA) हमारे दांतों की संख्या को कम करके हमें भविष्य के ‘छोटे चेहरे’ वाले मानव (The Future Human) के रूप में तैयार कर रहा है। यह म्यूटेशन पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रहा है, जिससे भविष्य में 32 दांतों का होना एक दुर्लभ घटना (Anomaly) बन जाएगी।

मुंह में 32 दांत, अब हो जाएगी पुरानी बात

डॉक्टर पल्लवी वशिष्ठ, रुहेलखंड डेंटल कॉलेज

बचपन से आहार पर ध्यान दें माता-पिता

डॉक्टर पल्लवी ने बताया कि अगर बचपन से बच्चों के आहार व खाने-पीने की चीजों का ध्यान रखा जाए तो अक्ल दाड़ न आने की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है।

आहार की बनावट: जबड़े के विकास के लिए ‘मैस्टिकेशन’ (चबाना) सबसे अच्छा व्यायाम है।

सख्त फल और सब्जियां: बच्चों को फलों का जूस देने के बजाय उन्हें फल काट कर दें। सेब, गाजर, और खीरा जैसे सख्त फल चबाने से जबड़े की मांसपेशियों और हड्डियों पर दबाव पड़ता है, जो उनके विस्तार (Expansion) में मदद करता है।

मोटे अनाज का समावेश: आहार में बाजरा, ज्वार या भुट्टा (Corn on the cob) शामिल करें। भुट्टे को सीधे डंठल से दांतों से खींचकर खाना जबड़े की हड्डियों के लिए एक बेहतरीन कसरत है।

प्रोसेस्ड फूड से दूरी: ब्रेड, पास्ता और अत्यधिक उबली हुई नरम सब्जियों का सेवन कम करें, क्योंकि इन्हें चबाने के लिए किसी बल की आवश्यकता नहीं होती।

‘माउथ ब्रीदिंग’ (मुंह से सांस लेना) पर नियंत्रण

जबड़े के विकास में सबसे बड़ी बाधा ‘मुंह से सांस लेना’ है। यदि बच्चा सोते समय या जागते समय मुंह खुला रखता है, तो यह जबड़े के विकास को प्रभावित करता है। मुंह से सांस लेने से ऊपरी जबड़ा संकुचित (V-shape) हो जाता है और चेहरा लंबा दिखने लगता है।

जीभ की स्थिति: वैज्ञानिक रूप से, जीभ को हमेशा तालु (Roof of the mouth) से सटा होना चाहिए। यह जीभ का दबाव ही है, जो ऊपरी जबड़े को चौड़ा करता है। यदि बच्चा मुंह से सांस लेता है, तो जीभ नीचे गिर जाती है और जबड़ा विकसित नहीं हो पाता।

बचपन की कुछ आदतों पर रोक

कुछ आदतें जबड़े की हड्डियों को गलत दिशा में मोड़ सकती हैं:-

अंगूठा चूसना (Thumb Sucking): 3-4 साल की उम्र के बाद भी अंगूठा चूसने से ऊपरी जबड़ा बाहर की ओर निकल आता है और संकुचित हो जाता है।

एक तरफ से चबाना: सुनिश्चित करें कि बच्चा दोनों तरफ के दांतों का समान उपयोग करे। एक तरफ से चबाने से चेहरे की मांसपेशियों में असंतुलन पैदा हो सकता है।

माता-पिता के लिए चेकलिस्ट (Age-wise Guide)

डॉक्टर पल्लवी वशिष्ठ ने बताया कि माता-पिता अगर कुछ बातों का ध्यान रखें तो इस समस्या से निजात पाई जा सकती है। जैसे 0-2 वर्ष लंबे समय तक स्तनपान (यह जबड़े की मांसपेशियों को मजबूत करता है)। 2-6 वर्ष ‘फिंगर फूड्स’ देना शुरू करें, मुंह से सांस लेने की जांच करें। 6-12 वर्ष दूध के दांत गिरने और नए दांत आने पर डेंटिस्ट से जबड़े के विस्तार की जांच कराएं।

एक्सपर्ट्स के कमेंट

“हमारे शरीर की सबसे खास बात यह है कि जिन अंगों का इस्तेमाल नहीं होता, उनकी उपयोगिता धीरे-धीरे खत्म हो जाती है। मौजूदा दौर में हमने ठोस व चबा-चबाकर खाने वाली चीजों का सेवन लगभग बंद कर दिया है। ऐसे में अक्लदाड़ न आने की समस्या तेजी से बढ़ रही है। पिछले कुछ बरसों में ऐसे तमाम मामले आ रहे हैं। आने वाली पीढ़ी मुंह में 30 या 28 दांत लेकर ही जिएगी। ऐसा कुदरत नहीं कर रही, हमारी आदतों की वजह से हो रहा है।”

-डॉक्टर शिवांगी शर्मा

 

“खानपान की बदलती आदतों की वजह से जबड़ा छोटा हो रहा है। पिछले कुछ बरसों में अक्लदाड़ न उगने के तमाम मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। कुछ मामलों में दांत उगते ही नहीं हैं और तमाम मामलों में एक के ऊपर एक दांत चढ़ जाता है। समाज में यह मिथक है कि दूध के दांत खराब होना आम बात है। मगर, यही सबसे बड़ी गलत है। अगर हम दूध के दांतों का ठीक से ध्यान रखें तो पक्के दांत भी ठीक से आएंगे।”

-डॉक्टर पल्लवी वशिष्ठ

मुंह में 32 दांत, अब हो जाएगी पुरानी बात

चंद्रशेखर कांडपाल, प्रशासनिक अधिकारी, रुहेलखंड डेंटल कॉलेज

“रोजाना तमाम अभिभावक अपने बच्चों की दांतों की समस्या लेकर हमारे पास आते हैं। पिछले कुछ बरसों से अक्ल दाड़ न आने या दांत टेडे़ होने के मामले कुछ ज्यादा ही आ रहे हैं। अगर माता-पिता बचपन से ही बच्चों के खान-पान की आदतों पर ध्यान दें तो यह समस्या काफी हद तक कम हो सकती है। हम लोग दंत जागरूकता को लेकर हर साल बड़ा अभियान चलाते हैं। इस बार के अभियान में यह मामला प्रमुखता से शामिल रहेगा।”

-चंद्रशेखर कांडपाल, प्रशासनिक अधिकारी, रुहेलखंड डेंटल कॉलेज

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