वाराणसी: वाराणसी पुलिस ने अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक्टिव कफ सिरप तस्करी और हवाला नेटवर्क का पर्दाफाश किया है। इस कांड के मास्टरमाइंड शुभम जायसवाल के सिंडिकेट से जुड़े पांच गुर्गों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस की जांच में सामने आया है कि यह गिरोह ‘नीले का पीला’ कोडवर्ड का इस्तेमाल कर कफ सिरप के मुनाफे से सोना खरीदता था और करोड़ों के काले धन को सफेद (Money Laundering) करता था।
एडीसीपी वरुणा जोन नीतू कादयान ने बताया कि यह गिरोह ₹100 की कफ सिरप की शीशी को थोक भाव में खरीदकर बिहार, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में ₹700 तक में बेचता था।
कोडवर्ड: कफ सिरप को ‘नीला’ और सोने को ‘पीला’ कहा जाता था।
तस्करी रूट: तस्करी से मिले मुनाफे को पश्चिम बंगाल या बांग्लादेश में सोने में बदला जाता था। फिर वह सोना तस्करी कर बनारस लाया जाता था, जिसे करेंसी में बदलकर हवाला के जरिए सफेद किया जाता था।
फर्जी फर्मों का मकड़जाल (हवाला नेटवर्क)
गिरोह ने जांच से बचने के लिए डमी संचालकों के नाम पर 40 से अधिक फर्जी फर्में (Shell Companies) खोल रखी थीं। पैसा सीधे शुभम जायसवाल के पास नहीं जाता था। यह तीन से चार लेयर की बोगस फर्मों (जैसे सिंह मेडिकोज, अलउकबा एजेंसी, एसपी फार्मा) के बैंक खातों से होते हुए शुभम की फर्म ‘शैली ट्रेडर्स’ और ‘न्यू वृद्धि ट्रेडर्स’ तक पहुंचता था। केवल ‘अलउकबा’ नामक कागजी फर्म से ₹17 करोड़ का लेन-देन पाया गया है। शुरुआती जांच में 1.5 साल के भीतर करोड़ों के काले धन को आरटीजीएस/कैश के जरिए सफेद करने के सबूत मिले हैं।
गिरफ्तारी और बरामदगी
रोहनिया और सारनाथ पुलिस ने संयुक्त कार्रवाई करते हुए स्वप्निल केसरी, दिनेश यादव, आशीष यादव, विष्णु कुमार पांडेय और लोकेश अग्रवाल को गिरफ्तार किया है। लोकेश के पास से बोगस फर्मों की मुहरें, चेकबुक, लैपटॉप, मोबाइल और भारी मात्रा में फर्जी बिल बरामद हुए हैं।
पुलिस की नजर से कैसे बचते थे?
गिरोह माल की बिलिंग जान-बूझकर ₹50,000 से कम रखता था ताकि ई-वे बिल (E-Way Bill) जेनरेट न हो। बाद में सीधे कंपनी से ‘सुपर स्टॉकिस्ट’ बनकर करोड़ों का माल मंगाया जाने लगा और फर्जी ई-वे बिल के जरिए उसे तस्करी के अड्डों तक पहुँचाया गया।
‘नीले से पीला’ का खेल
इस सिंडिकेट ने अपराध की दुनिया में अपना एक अलग कोडवर्ड विकसित किया था। गिरोह थोक दरों पर कफ सिरप (संभवत: कोडीन आधारित) ₹100 प्रति शीशी में खरीदता था। इसे बिहार, बंगाल और बांग्लादेश की सीमाओं पर ₹700 से ₹1000 तक में बेचा जाता था। तस्करी से मिलने वाले भारी मुनाफे को वापस नकद में लाने के बजाय, उसे बांग्लादेश या बंगाल में सोना खरीदने में लगाया जाता था। यह सोना तस्करी के जरिए वापस वाराणसी लाया जाता था।
मनी लॉन्ड्रिंग और हवाला नेटवर्क
काले धन को सफेद करने के लिए गिरोह ने अत्यंत आधुनिक तरीके अपनाए। पुलिस ने अब तक 41 फर्जी कंपनियों को ट्रेस किया है। ये कंपनियां केवल कागजों पर थीं। लोकेश अग्रवाल और शुभम जायसवाल गरीब या अनजान लोगों को सालाना ₹2 लाख देकर उनके नाम पर फर्म खोलते थे, लेकिन बैंक खातों का पूरा नियंत्रण (चेकबुक, एटीएम, लॉगिन आईडी) खुद अपने पास रखते थे। पैसा एक बार में मुख्य आरोपी के खाते में नहीं जाता था। यह 3 से 4 परतों (Layers) में घूमता था।
‘अलउकबा एजेंसी’ (₹17 करोड़ ट्रांजेक्शन) और ‘सिंह मेडिकोज’ (₹10 करोड़ ट्रांजेक्शन) जैसी फर्जी फर्मों के खातों में पैसा जमा होता था, फिर वहां से आरटीजीएस के जरिए मास्टरमाइंड शुभम जायसवाल की मुख्य फर्मों ‘शैली ट्रेडर्स’ और ‘न्यू वृद्धि ट्रेडर्स’ में पहुँचता था।
रसद और ई-वे बिल में फर्जीवाड़ा
ई-वे बिल से बचाव: जीएसटी नियमों के अनुसार ₹50,000 से अधिक के माल पर ई-वे बिल अनिवार्य है। पुलिस से बचने के लिए ये लोग जानबूझकर बिल की राशि ₹50,000 से कम रखते थे ताकि कागजी रिकॉर्ड न बने।
फर्जी गोदाम: कागजों पर जिन दुकानों (जैसे सिंह मेडिकोज) का पता दिया गया था, भौतिक सत्यापन (Physical Verification) पर वहां केवल एक खाली कमरा मिला। वहां न कोई स्टॉक था और न ही व्यापार का कोई रिकॉर्ड।
सिंडिकेट के मुख्य किरदार
शुभम जायसवाल: इस पूरे घोटाले का ‘किंगपिन’ (मास्टरमाइंड)। इसने रांची में ‘सुपर स्टॉकिस्ट’ बनकर सीधे कंपनियों से माल उठाना शुरू किया था।
लोकेश अग्रवाल: फर्जी फर्मों का प्रबंधन, मुहरें और डिजिटल सिग्नेचर का रख-रखाव करने वाला मुख्य गुर्गा।
प्रतीक गुजराती: हवाला ऑपरेटर, जो सोने को करेंसी में बदलने और कोड नंबर के जरिए नोटों की गड्डियां मंगवाने का काम करता था।
पुलिस की जांच का दायरा
एडीसीपी नीतू कादयान के नेतृत्व में पुलिस ने केवल पिछले डेढ़ साल के रिकॉर्ड की जांच की है, जिसमें करोड़ों का हेरफेर सामने आया है। पुलिस अब उन फार्मा कंपनियों (जैसे एबॉट) की भूमिका की भी जांच कर सकती है जिनसे इतनी भारी मात्रा में माल उठाया गया, साथ ही बैंकों की भूमिका भी संदिग्ध है, जहां बिना किसी वास्तविक व्यापार के करोड़ों का लेन-देन होता रहा।