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रिद्धिमा में महाकवि कालिदास लिखित अभिज्ञान शाकुंतलम का मंचन

रिद्धिमा में महाकवि कालिदास लिखित अभिज्ञान शाकुंतलम का मंचन

बरेली: एसआरएमएस रिद्धिमा के सभागार में रविवार (11 जनवरी) को दिल्ली के रूबरू थिएटर ग्रुप की ओर से नाटक अभिज्ञान शाकुंतलम का मंचन किया गया। महाकवि कालिदास लिखित इस नाटक की परिकल्पना और निर्देशन काजल सूरी का रहा। महाकवि कालिदास लिखित अभिज्ञान अभिज्ञान शाकुन्तलम चौथी शताब्दी के आसपास की रचना है, लेकिन इसकी कथा महाभारत काल से भी पहले की है। महाकाव्य महाभारत के आदि पर्व में दुष्यंत और शाकुन्तला की इस कथा का उल्लेख है।

इसके अलावा हमारे 18 पुराणों में से एक पद्म पुराण में भी यह दर्ज़ है। इस कथा को अभिज्ञान शाकुंतलम ग्रंथ के रूप में रचने का श्रेय महाकवि कालिदास को जाता है। मूलतः यह रचना संस्कृत भाषा में है, लेकिन विश्व की लगभग सभी भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है। इस नाटक के साथ विशेष बात यह है कि यह भारत का नाटक है, जो विदेशी धरती पर मंचित किया गया था। अभिज्ञान शाकुंतलम कालिदास की पहली कृति थी जिसका अंग्रेजी में अनुवाद किया गया। इस अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित जर्मन अनुवाद (1791 . में प्रकाशित) की गोएथे ने इतनी प्रशंसा की कि यह पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो गया। सहज सौंदर्य साधनों की अपेक्षा नहीं करता, वह अपने आप में सहज सरल और प्राकृतिक रूप से संपन्न है। इस नाटक का केंद्रीय भाव है।

इस तरह है संक्षिप्‍त कथा

अभिज्ञान शाकुंतलम में राजा दुष्यन्त और शाकुन्तला के प्रणय, विवाह, विरह तथा पुनर्मिलन की एक सुन्दर कथा है। संक्षिप्त कथा इस तरह है। शाकुन्तला राजा दुष्यन्त की पत्नी थी, जो भारत के सुप्रसिद्ध राजा भरत की माता और मेनका अप्सरा की कन्या थी। महाभारत के अनुसार शाकुन्तला का जन्म मेनका अप्सरा के गर्भ से हुआ था, जो उसे वन में छोड़कर चली गई। वन में शंकुतों (पक्षियों) आदि ने हिंसक पशुओं से इसकी रक्षा की थी, इसी से इसका नाम शाकुन्तला पड़ा।

राजा दुष्यंत एक शिकार यात्रा के दौरान शाकुन्तला से मिलते हैं और दोनों एक दूसरे के प्रति आसक्त हो उठते हैं। जब दुष्यन्त अपने राज्य में लौटने के लिए प्रस्थान करता है, तो शाकुन्तला का हृदय टूट जाता है। कुछ समय बाद वह अपने पुत्र भरत को जन्म देती है। अंततः दुष्यन्त को शाकुन्तला के प्रति अपने प्रेम की याद आती है और वह उसे तथा अपने बच्चे को खोजने के लिए जंगल में लौट आता है और नाटक उनके पुनर्मिलन तथा मेलमिलाप के साथ समाप्त होता है। कालिदास की काव्य प्रतिभा ने उसे साहित्य में अमर बना दिया।

इनकी रही मौजूदगी

नाटक में शुभम शर्मा, तरुण मग्गो, सुजाता जैन, तनीषा गांधी, गीता सेठी, राशि, कृष बब्बर, अपूर्व, भूपेश, प्रवीण यादव ने अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया। नाटक में मेकअप राशिद और संगीत संचालन प्रवीण और शुभम का रहा। मंच के पीछे की जिम्मेदारी कपिल ने संभाली और प्रोडक्शन मैनेजर रोहित कुमार का रहा। इस अवसर पर एसआरएमएस ट्रस्ट के संस्थापक व चेयरमैन देव मूर्ति, आदित्य मूर्ति, ऋचा मूर्ति, उषा गुप्ता, सुभाष मेहरा, डॉ. प्रभाकर गुप्ता, डॉ. अनुज कुमार, डॉ. एमएस बुटोला, डॉ. मनोज टांगड़ी, डॉ. शैलेश सक्सेना, डॉ. आशीष कुमार मौजूद रहे।

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