बेदम फेफड़ों को आपके सहारे की जरूरत, तेजी से फैल रहा है अस्थमा

बेदम फेफड़ों को आपके सहारे की जरूरत, तेजी से फैल रहा है अस्थमा

बरेली: 90 के दशक में टीवी पर मशहूर एक विज्ञापन का स्लोगन था- ’60 साल के बूढ़े या साठ साल के जवान’, शायद आपको यह याद आ गया हो। इसमें युवा जोड़े का पुरुष साथी थकता हुआ बेदम दिखता था और बुजुर्ग जोड़े का पुरुष फुर्तीला व ऊर्जावान। ऊंचाई से फूल तोड़ कर लाने में समर्थ, क्यों था ऐसा? इसकी वजह थी उसके फेफड़ों का साथ देना। रक्त को हर अंग तक ले जाने के लिए भरपूर आक्सीजन उपलब्ध कराना। हालांकि, यह एक विज्ञापन था। आज युवा जोड़ों की बात तो छोड़िये बच्चों के फेफड़े भी बेदम हो रहे हैं। इनकी संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है।

ऐसा रहा तो आने वाले कुछ ही वर्षों में युवा कहने को ही युवा होंगे। फेफड़ों के हांफने से न उनमें ऊर्जा होगी और न जोश। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इससे चिंतित है। इसीलिए हर वर्ष मई के पहले मंगलवार को विश्व अस्थमा दिवस मनाता है। आप भी इस मौके पर अपने फेफड़ों को आक्सीजन देकर विज्ञापन में दिखने वाले ’60  साल के जवान का मुकाबला कर सकते हैं।’

अस्‍थमा या दमा एक आम बीमारी

एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज में पल्मोनरी विभाग के एचओडी डॉ. ललित सिंह कहते हैं कि अस्थमा या दमा एक आम बीमारी है। दुनिया भर में लाखों लोग इससे प्रभावित हैं। इसमें श्वसनमार्ग में संकुचन और फेफड़ों की सूजन होती है। इससे सांस लेने में परेशानी होती है और सांस फूलने लगती है। यह एलर्जी, व्यायाम, दवाओं या पर्यावरणीय परिस्थितियों जैसे कारणों से भी हो सकता है। यह आजीवन बीमारी है। हालांकि, दवाओं के निरंतर उपयोग और दमा बढ़ाने वाले कारणों से बचाव पर यह ठीक हो सकता है।

उन्‍होंने कहा कि उपचार न होने और सांस लेने में दीर्घकालीन रुकावट से यह लाइलाज होकर गंभीर हो सकता है। अमूमन बुजुर्गों को प्रभावित करने वाली यह बीमारी अब हर आयु वर्ग को परेशान कर रही है। अस्थमा की शुरूआत वायरल इंफेक्शन से होती है। बार-बार सर्दी लगना और बुखार की अनदेखी से यह इंफेक्शन अस्थमा में बदल जाता है। अस्थमा का अटैक अचानक पड़ता है। जो जानलेवा भी साबित हो सकता है। यह किसी भी उम्र में हो सकता है।

बच्‍चों में अस्‍थमा सबसे सामान्‍य बीमारी

डॉ. ललित कहते हैं कि डब्ल्यूएचओ के अनुसार बच्चों में अस्थमा सबसे सामान्य बीमारी है। तेजी से बढ़ रही है और बड़ों में होने वाले अस्थमा से भिन्न है। 80 फीसदी बच्चों में अस्थमा के लक्षण छह वर्ष से पहले ही शुरू हो जाते हैं। खुशी की बात है कि यह बड़े होने पर सही भी हो जाते हैं। भारत में कुल आबादी का करीब 10 फीसद (32 मिलियन) बच्चे अस्थमा के पीड़ित हैं। उत्तर भारत में यह संख्या अधिक है। इससे मृत्युदर 42 फीसद है।

अस्थमा बढ़ने की वजह आरामतलब होती जीवनशैली, असंतुलित खानपान, बढ़ता प्रदूषण और फिजिकल एक्टिविटी का कम होना है। इम्यूनिटी वीक होने से घर से बाहर निकलने पर वातावरण की धूल और धुएं के कण से उन्हें परेशान करते हैं। इससे एलर्जी अस्थमा में बदल जाती है। मौसम में बदलाव पर भी परेशान करता है। एक बार अस्थमा हो जाने के बाद इससे छुटकारा जल्द नहीं मिलता। राहत मिलने के बाद भी उपचार जारी रखना जरूरी है। चिकित्सक के परामर्श के बिना दवाइयां न बंद करें। लगातार फालोअप करते रहें।

क्यों मनाया जाता है विश्व अस्थमा दिवस?

विश्व के सभी शहरों में खासकर प्रदूषित शहरों में अस्थमा मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इससे लोगों में जागरूक करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) हर वर्ष विश्व अस्थमा दिवस मनाता है। प्रत्येक वर्ष यह मई माह के पहले मंगलवार को यह मनाया जाता है। ग्लोबल इनिशिएटिव फार अस्थमा (जीआईएनए) द्वारा सभी देशों में कार्यक्रम आयोजित कर अस्थमा के प्रति जानकारी दी जाती है। पहली बार विश्व अस्थमा दिवस वर्ष 1998 में बार्सिलोना और स्पेन सहित 35 देशों ने मनाया था।

क्या है अस्थमा, कैसे पहचानें?

  • अस्थमा श्वसनमार्ग की बीमारी है। श्वसनमार्ग संकुचित हो जाता है। सांस लेने में दिक्कत होती है।
  • दमा आमतौर पर वंशानुगत होता है। लेकिन यह एक व्यक्ति से दूसरे में नहीं फैलता।
  • खांसी आना सामान्य है। लेकिन 3-4 हफ्ते से ज्यादा खांसी अस्थमा का लक्षण होता है।
  • सीने में घरघराहट, सीटी की आवाज, सीने में जकड़न, खांसी और सांस लेने में दिक्कत।
  • मां-बाप में अस्थमा या एलर्जी होने से बच्चों में अस्थमा की आशंका बढ़ जाती है।
  • रात भर ठीक से नींद न आना और सुबह भी थका हुआ रहना।

एसआरएमएस में हैं सुविधाएं

एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज में अस्थमा से उपचार के लिए काबिल विशेषज्ञों की टीम है। पल्मोनरी विशेष रूप से यहां पर अस्थमा क्लीनिक संचालित की जाती है। हफ्ते में दो दिन बुधवार और शनिवार को संचालित इस क्लीनिक में स्पायरोमीट्री और पीक फ्लो मीटर के जरिये अस्थमा के मरीजों की जांच की जाती है। इससे श्वसन मार्ग में अवरोध की मात्रा का मूल्यांकन किया जाता है।

क्यों होता है अस्थमा का अटैक?

  • उमस और बदलते मौसम में बाहर रहना और देर तक बाहर घूमना।
  • ठंडी हवा।
  • वायरस, बैक्टीरिया, धूल, मिट्टी या परागकणों के संपर्क से होने वाली एलर्जी।
  • लंबे समय तक तकिया या चादर का न बदलना।
  • प्रदूषण, बार-बार धुएं वाले इलाकों में निकलना या रहना।
  • घर में पालतू जानवरों के बाल और रूसी।
  • खाने में ज़्यादा नमक का इस्तेमाल।
  • ज़्यादा धूम्रपान और शराब का सेवन और मोटापा।
  • सर्दियों में खांसी-ज़ुकाम का ठीक इलाज न करना।
  • आनुवंशिकता। माता-पिता का अस्थमा से पीड़ित होना।

कैसे करें अस्थमा से बचाव?

  • धूल-मिट्टी, धुएं, कीटनाशक स्प्रे, मच्छर भगाने वाले क्वाइल, अगरबत्ती के धुएं से दूर रहें।
  • पालतू जानवरों से थोड़ी दूरी बनाएं। जानवर को हर हफ्ते नहलाएं।
  • वॉकिंग, लो इम्पेक्ट एरोबिक्स जैसे फेफड़ों से जुड़े व्यायाम करें।
  • ताजे पेंट से बचें और घर की नियमित साफ-सफाई।
  • पुराने धूल-मिट्टी से भरे कपड़ों से दूर रहें, धूम्रपान बिल्कुल न करें।
  • व्यायाम के समय अपनी दवा और इनहेलर साथ रखें।
  • रंगयुक्त व फ्लेवर, एसेंस, प्रिजर्वेटिव मिले हुए खाद्य पदार्थों, कोल्ड ड्रिंक्स से यथा संभव बचें।
  • खाने में खट्टी चीजें, ज्यादा ठंडा पानी का सेवन न करें। संभव हो तो चावल खाने से बचें।

भोजन में क्या लें, क्या नहीं?

  • आहार में विटामिन ए और विटामिन डी की मात्रा बढ़ाएं। यह फेफड़ों को मजबूत करते हैं।
  • विटामिन ई से भरपूर आहार लें। यह श्वसनमार्ग की सूजन कम करता है।
  • भोजन में ओमेगा 3 और ओमेगा 6 जैसे पालीअनसेचुरेटेड फैटी एसिड की मात्रा बढ़ाएं।
  • भोजन में सैचुरेटेड फैटी एसिड न लें। यह मीट, चीज, आइसक्रीम, दूध में होता है।
  • कुछ घरेलू नुस्खों को अपनाकर भी आप बच्चों को अस्थमा से फायदा पहुंचा सकते हैं। उन्हें शहद के साथ मुनक्का दें।
  • कोशिश करें कि गरम पानी पीने की आदत डालें।
  • हल्दी एक प्राकृतिक एंटीबायोटिक होती है। बच्चों को दूध में हल्दी मिलकार पिलाएं।

अस्थमा और योग

दिनचर्या में नियमित रूप से कुछ योगासन शामिल कर अस्थमा को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इनमें प्राणायाम, कपालभाति, अर्ध मत्स्येंद्रासन, पवनमुक्तासन, सेतु बंधासन, भुजंगासन, अधो मुखस्वानासन, बंदकोनासन मुख्य हैं।

अस्थमा के बारे में मिथक और तथ्य

  • मिथकअस्थमा अल्पकालिक बीमारी है।
  • तथ्ययह दीर्घकालिक बीमारी है, जो लोगों को जीवनभर के लिए प्रभावित करती है। इसका निरंतर उपचार आवश्यक है।
  • मिथकइन्हेलर का प्रभाव खाने वाली दवाइयों से कम है। इनसे एडिक्शन बढ़ता है।
  • तथ्य इन्हेलर खाने वाली दवाइयों से ज्यादा प्रभावी हैं। यह नशा नहीं हैं। कोई आदत नहीं पड़ती।
  • मिथकइन्हेलर के नियमित प्रयोग से बच्चे सुस्त हो जाते हैं, विकास धीमा होता है।
  • तथ्यनहीं, इन्हेलर का बच्चे के विकास या जीवन पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता।
  • मिथक इन्हेलर के उपयोग से भोजन की आदतों में बदलाव करना पड़ता है।
  • तथ्य नहीं, भोजन की आदतों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
  • मिथक अस्थमा संक्रामक बीमारी है और एक से दूसरे में फैलती है।
  • तथ्य नहीं, यह संक्रामक नहीं, आनुवांशिक बीमारी है।
  • मिथक वैकल्पिक इलाज से दमा ठीक हो सकता है।
  • तथ्य दमा का काई इलाज नहीं है। इसे सिर्फ नियंत्रित किया जा सकता है।
  • मिथक एलर्जी परीक्षण से दमा का इलाज संभव है।
  • तथ्य एलर्जी परीक्षण उन चीजों की पहचान कर सकता है जिनसे आपको एलर्जी ह । यह दमा का इलाज नहीं कर सकता।
  • मिथक दमा से किसी की मौत नहीं हो सकती।
  • तथ्य इसका दौरा घातक होता है। दुर्लभ मामलों में इससे मौत भी संभव है।
  • मिथक केवल बच्चों को दमा होता है।
  • तथ्य यह किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकता है।
  • मिथक अस्थमा रोगी व्यायाम नहीं कर सकते।
  • तथ्य अस्थमा का अटैक पड़ने वालों को छोड़ कर सभी व्यायाम कर सकते हैं।
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