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-‘रोग से पहले स्वास्थ्य की रक्षा’ ही है संतुलित जीवनशैली का सिद्धांत
अभिषेक पाण्डेय
Special Interview: आज के दौर में जब आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने तेजी से प्रगति की है और लोग तत्काल परिणामों की चाह में एलोपैथिक दवाओं पर अधिक निर्भर होते जा रहे हैं, ऐसे समय में आयुर्वेद की प्रासंगिकता और उपयोगिता पर चर्चा बेहद जरूरी हो जाती है। हजारों वर्षों पुरानी यह चिकित्सा पद्धति केवल रोग का उपचार नहीं करती, बल्कि ‘रोग से पहले स्वास्थ्य की रक्षा’ का सिद्धांत अपनाकर सम्पूर्ण जीवनशैली को संतुलित करने का संदेश देती है। इन्हीं विषयों पर डॉ. केडी तिवारी (वरिष्ठ आयुर्वेदिक फिजीशियन) से बातचीत की गई, जो पिछले कई दशकों से आयुर्वेद के सिद्धांतों को आधुनिक जीवनशैली के साथ जोड़ने का कार्य कर रहे हैं।

डॉ. केडी तिवारी (वरिष्ठ आयुर्वेदिक फिजीशियन)
डॉ. तिवारी न केवल रोगियों के उपचार में पारंपरिक औषधियों का प्रयोग करते हैं, बल्कि जीवनशैली, आहार और मानसिक स्वास्थ्य के संतुलन को भी समान महत्व देते हैं। इस विशेष बातचीत में उन्होंने आधुनिक जीवन की तेज रफ्तार, तनाव, फास्ट फूड और स्क्रीन टाइम जैसी चुनौतियों के बीच आयुर्वेद की भूमिका पर अपने विचार साझा किए। साथ ही उन्होंने बताया कि कैसे कुछ सरल आयुर्वेदिक दिनचर्याएं अपनाकर आम व्यक्ति लंबे समय तक स्वस्थ रह सकता है। पढ़िए इस बातचीत के कुछ विशेष अंश….
सवाल: आज के दौर में जब लोग आधुनिक दवाइयों पर निर्भर हैं, ऐसे में आयुर्वेद की प्रासंगिकता आप कैसे देखते हैं?
जवाब: आयुर्वेद, जीवन विज्ञान है। आयुर्वेद में आहार-विहार प्रकृति के अनुसार होता है। आयुर्वेद केवल उपचार की पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक कला है। आधुनिक दवाइयां मुख्यत: रोग के लक्षणों को नियंत्रित करती हैं, जबकि आयुर्वेद का उद्देश्य रोग के मूल कारण को समझकर उसे समाप्त करना होता है। आज जब लोग तेज जीवनशैली, तनाव और असंतुलित आहार के कारण तरह-तरह की बीमारियों से घिरे हैं, तब आयुर्वेद पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो गया है।
आयुर्वेद हमें सिखाता है कि शरीर, मन और आत्मा इन तीनों का संतुलन ही स्वास्थ्य है। यह संतुलन यदि बिगड़ जाए, तो बीमारी होती है। आज के समय में जब जीवन असंतुलन से भरा है, तब आयुर्वेद हमें प्राकृतिक, दीर्घकालिक और सुरक्षित समाधान प्रदान करता है। यह सच है कि आधुनिक चिकित्सा आपातकालीन परिस्थितियों में अत्यंत उपयोगी है, लेकिन दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेदिक जीवनशैली जैसे सही आहार, दिनचर्या और ऋतुचर्या ही सबसे अधिक सहायक सिद्ध होती है।
सवाल: क्या आज की तेज रफ्तार जिंदगी में आयुर्वेद अपनाना व्यावहारिक है?
जवाब: हमारे पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। बस हमें यह समझना होगा कि आयुर्वेद कोई जटिल या समय लेने वाला अनुशासन नहीं, बल्कि जीवन को सरल और संतुलित बनाने की प्रक्रिया है। आज की तेज रफ्तार जिंदगी में भी अगर हम अपने दिनचर्या में छोटे-छोटे आयुर्वेदिक सिद्धांत जोड़ लें, जैसे- सही समय पर सोना-जागना, मौसमानुसार आहार लेना, मोबाइल स्क्रीन से थोड़ी दूरी रखकर मन को शांत करना, तो यह भी आयुर्वेद ही है।
आयुर्वेद हमसे बड़े परिवर्तन नहीं चाहता, बल्कि छोटे, लेकिन निरंतर सुधारों की मांग करता है। जैसे- सुबह गुनगुना पानी पीना, तेल से अभ्यंग (मालिश) करना, भोजन को ताजा और सात्विक रखना, ये सब ऐसी बातें हैं, जो व्यस्त जीवन में भी आसानी से अपनाई जा सकती हैं। आयुर्वेद कोई बीते युग की बात नहीं है, बल्कि आज की जीवनशैली में सामंजस्य बैठाने का सबसे व्यावहारिक विज्ञान है।
सवाल: आयुर्वेद ‘रोग से पहले स्वास्थ्य की रक्षा’ की बात करता है, इस सिद्धांत को आम जनता कैसे अपना सकती है?
जवाब: देखिए, आयुर्वेद की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह केवल बीमारी के इलाज की बात नहीं करता, बल्कि बीमार होने से पहले खुद को स्वस्थ रखने की कला सिखाता है। ‘रोग से पहले स्वास्थ्य की रक्षा’ का अर्थ है- अपनी दिनचर्या, आहार, और मानसिक स्थिति को ऐसा बनाना कि रोग पैदा ही न हो। आम जनता इसे बहुत सरल तरीके से अपना सकती है, कुछ नियमों को फॉलो करके…
- -रोज सुबह समय पर उठना, शरीर को हल्की कसरत या योग से सक्रिय रखना।
- -मौसमानुसार आहार और पाचन के अनुकूल भोजन लेना।
- -समय पर भोजन, पर्याप्त नींद और तनाव से दूरी बनाए रखना।
- -समय-समय पर ऋतुचर्या और पंचकर्म जैसे उपायों से शरीर को शुद्ध करना।
नित्यं हिताहितं युक्तं, नित्यं चात्मपरिक्षणम्। यानी जो व्यक्ति प्रतिदिन यह सोचता है कि उसके लिए क्या हितकारी है और क्या नहीं, वही सच्चे अर्थों में स्वस्थ रह सकता है। आज की भाषा में कहें तो, प्रिवेंशन (रोकथाम) आयुर्वेद का मूल है और यह सिद्धांत हर व्यक्ति अपने घर में, अपनी दिनचर्या में, आसानी से अपना सकता है।
सवाल: आज की जीवनशैली (फास्ट फूड, स्क्रीन टाइम, तनाव) से कौन–कौन सी बीमारियां सबसे ज्यादा बढ़ रही हैं?
जवाब: असंतुलन। लोग देर रात तक जागते हैं, समय पर भोजन नहीं करते, फास्ट फूड और ठंडी चीजों का अत्यधिक सेवन करते हैं और मानसिक तनाव में जीते हैं। इन सबका सीधा असर हमारे पाचन तंत्र, हृदय, मस्तिष्क और हार्मोनल संतुलन पर पड़ता है। आयुर्वेद के दृष्टिकोण से देखें तो इस जीवनशैली ने वात, पित्त और कफ, तीनों दोषों का संतुलन बिगाड़ दिया है। इस असंतुलन के कारण आज सबसे अधिक जो बीमारियां बढ़ रही हैं, वे हैं-मोटापा (स्थूलता), मधुमेह (डायबिटीज), उच्च रक्तचाप (हाई बीपी), पाचन विकार, एसिडिटी, कब्ज़, तनाव, अनिद्रा, डिप्रेशन जैसी मानसिक समस्याएं और युवाओं में भी बाल झड़ना, त्वचा रोग और थकान जैसी समस्याओं का बढ़ना।
पहले जो रोग 50-60 वर्ष की उम्र में आते थे, अब वे 25-30 की उम्र में दिखाई दे रहे हैं। इसका कारण केवल बाहरी वातावरण नहीं, बल्कि जीवनशैली का असंतुलन है। आयुर्वेद हमें सिखाता है कि यदि हम दिनचर्या (दिन का रूटीन), ऋतुचर्या (मौसम के अनुसार जीवनशैली) और आहारचर्या (भोजन के नियम) को संतुलित कर लें, तो इन अधिकांश बीमारियों से आसानी से बचा जा सकता है। इसलिए समाधान बाहर नहीं, हमारी आदतों में बदलाव से ही संभव है।
सवाल: क्या कुछ सरल आयुर्वेदिक दिनचर्या या नित्य क्रिया हैं, जिन्हें अपनाकर आम व्यक्ति लंबे समय तक स्वस्थ रह सकता है?
जवाब: बिल्कुल, आयुर्वेद का सबसे बड़ा सौंदर्य यही है कि इसमें स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए बहुत सरल और प्राकृतिक उपाय बताए गए हैं। अगर कोई व्यक्ति रोजमर्रा की जिंदगी में कुछ छोटी-छोटी आयुर्वेदिक दिनचर्याएं अपनाए तो वह लंबे समय तक स्वस्थ रह सकता है।
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–ब्रह्म मुहूर्त में उठना (सूर्योदय से पहले): इससे शरीर की ऊर्जा संतुलित रहती है और मन शांत रहता है।
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–गुनगुना पानी पीना: यह शरीर से विषाक्त पदार्थ (टॉक्सिन्स) निकालने में मदद करता है।
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–तेल से अभ्यंग (मालिश): रोज या सप्ताह में 2-3 बार तिल या नारियल तेल से मालिश करने से त्वचा, हड्डियां और तंत्रिकाएं मजबूत होती हैं।
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योग और प्राणायाम: मानसिक शांति और शारीरिक लचीलापन बनाए रखते हैं।
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नस्य और ध्यान: नाक में औषधीय तेल की कुछ बूंदें डालना और रोज कुछ समय ध्यान में बैठना मस्तिष्क और मन दोनों को सुदृढ़ करता है।
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सात्विक आहार: ताजा, हल्का और मौसमानुसार भोजन करना, यह पाचन को सुधारता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।
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समय पर नींद: रात में 10 बजे तक सो जाना, यह शरीर की मरम्मत प्रक्रिया को पूर्ण होने देता है।
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आयुर्वेद कहता है- दिनचर्या ही औषधि है। अगर हम अपनी दिनचर्या को प्रकृति के अनुसार बना लें तो औषधियों की आवश्यकता बहुत कम रह जाती है। इसलिए आयुर्वेद अपनाने का अर्थ यह नहीं कि हमें जीवन में बड़ा परिवर्तन करना पड़े, बल्कि यह समझना कि स्वास्थ्य हमारे छोटे-छोटे अनुशासन में ही छिपा है।
सवाल: बहुत से लोग आयुर्वेद को “धीमे असर वाली चिकित्सा” मानते हैं, इस धारणा को आप कैसे देखते हैं?
जवाब: यह आयुर्वेद को लेकर आम लोगों की सबसे बड़ी गलतफहमी है। यह धारणा इसलिए बनी है, क्योंकि लोग आयुर्वेद को केवल जड़ी-बूटी वाली दवा समझते हैं, जबकि यह वास्तव में जीवन का विज्ञान है। आयुर्वेद का उद्देश्य सिर्फ लक्षणों को दबाना नहीं, बल्कि रोग के मूल कारण को समाप्त करना है और जब किसी चीज को जड़ से ठीक किया जाता है तो उसमें थोड़ा समय तो लगता ही है। आधुनिक दवाइयां अक्सर त्वरित राहत देती हैं, लेकिन कभी-कभी वे रोग को भीतर से मिटाने के बजाय केवल उसका प्रभाव कम करती हैं। वहीं, आयुर्वेद शरीर की प्रकृति, दोष, आहार, मन और वातावरण, इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर उपचार करता है। इसलिए इसका असर गहरा, स्थायी और बिना दुष्प्रभाव वाला होता है। इसलिए मैं कहता हूं- आयुर्वेद धीमा नहीं, बल्कि स्थायी समाधान देने वाला विज्ञान है।
सवाल: क्या आयुर्वेदिक औषधियां बिना परामर्श के लेना सुरक्षित है?
जवाब: आयुर्वेदिक औषधियां प्राकृतिक अवयवों से बनी होती हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इन्हें बिना परामर्श के लिया जा सकता है। हर व्यक्ति की प्रकृति, आयु, स्वास्थ्य स्थिति और दोष का संतुलन अलग होता है। यही कारण है कि एक औषधि किसी व्यक्ति के लिए लाभकारी हो सकती है तो किसी अन्य के लिए हानिकारक भी। बिना विशेषज्ञ की सलाह के औषधियां लेने से…
- -असर न होने या कम असर होने की संभावना।
- -गलत खुराक से नुकसान।
- -कभी-कभी अन्य दवाओं के साथ प्रतिक्रिया (interaction) हो सकती है।
- -इसलिए आयुर्वेद में निदान और परामर्श (Consultation) को बहुत महत्व दिया गया है।
सच कहूं तो, आयुर्वेदिक उपचार तभी सुरक्षित और प्रभावशाली होता है, जब इसे विशेषज्ञ मार्गदर्शन और सही जीवनशैली के साथ अपनाया जाए। संक्षेप में नेचुरल जरूर है, लेकिन अनियंत्रित नहीं।
सवाल: मधुमेह, ब्लड प्रेशर और मोटापे जैसी जीवनशैली जनित बीमारियों में आयुर्वेद की भूमिका क्या है?
जवाब: मधुमेह, उच्च रक्तचाप और मोटापा, ये सभी जीवनशैली जनित बीमारियां हैं और इन्हें सिर्फ दवा से नियंत्रित करना पर्याप्त नहीं। आयुर्वेद का दृष्टिकोण पूरी तरह कारण आधारित है। इसका मतलब है कि हम सिर्फ लक्षणों को दबाने की बजाय रोग के मूल कारण- असंतुलित आहार, तनाव, कम शारीरिक गतिविधि, नींद की कमी को सुधारते हैं। आयुर्वेद में कुछ प्रमुख उपाय हैं…
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सात्विक और पाच्य भोजन: ताजा, हल्का, मौसमानुसार और समय पर भोजन।
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नित्यचर्या और व्यायाम: प्रतिदिन हल्की कसरत, योग, प्राणायाम।
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जड़ी–बूटियों और औषधियों का सही प्रयोग: जैसे- मेथी, जामुन, त्रिफला, हरिद्रा आदि (विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में)।
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तनाव प्रबंधन और मानसिक संतुलन: ध्यान और नियमित जीवनशैली।
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इन उपायों से न केवल मधुमेह, उच्च रक्तचाप और मोटापे पर नियंत्रण पाया जा सकता है, बल्कि रोग के बढ़ने की गति भी धीमी हो जाती है। संक्षेप में कहें तो आयुर्वेद इन बीमारियों के रोकथाम, नियंत्रण और उपचार में प्रभावी है, लेकिन यह तभी संभव है, जब व्यक्ति नियमित जीवनशैली और विशेषज्ञ परामर्श के साथ इसका पालन करे।
सवाल: अगर कोई व्यक्ति आज से ही आयुर्वेदिक जीवनशैली अपनाना चाहे तो पहला कदम क्या होना चाहिए?
जवाब: अगर कोई व्यक्ति आज से ही आयुर्वेदिक जीवनशैली अपनाना चाहता है तो सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम है- अपनी दिनचर्या और आहार पर ध्यान देना। कुछ सरल शुरुआत के उपाय हैं…
- समय पर उठना और सोना: सुबह ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पहले) उठना शरीर और मन दोनों को जागृत करता है।
- गुनगुना पानी पीना: यह शरीर से विषाक्त पदार्थ (टॉक्सिन्स) निकालने में मदद करता है।
- सात्त्विक और पाच्य भोजन अपनाना: ताजा, हल्का और मौसमानुसार भोजन।
- हल्का व्यायाम और योग: प्रतिदिन 20–30 मिनट हल्की शारीरिक गतिविधि और प्राणायाम।
- तनाव प्रबंधन: ध्यान, सांस की तकनीक या थोड़ी देर शांत समय बिताना।
ध्यान रखें कि आयुर्वेद का मंत्र है- “नित्यं हिताहितं युक्तं”, यानी हर दिन छोटे, सही और हितकारी कदम उठाना ही स्वास्थ्य की कुंजी है। पहला कदम है- अपने जीवन में संतुलन और जागरूकता लाना और बाकी बदलाव धीरे-धीरे स्वाभाविक रूप से आ जाते हैं।