कैंसर से घबराएं नहीं, यह अब लाइलाज नहीं

कैंसर से घबराएं नहीं, यह अब लाइलाज नहीं
  • स्तरीय सेंटर और कुशल डॉक्टरों की देखरेख में इलाज और हिम्मत से कैंसर पर काबू पाना आसान

बरेली: कैंसर का नाम ही इसकी भयावहता को बताने के लिए काफी है। कैंसर पीड़ित होने की जानकारी पर मरीज बीमारी से लड़ने की हिम्मत हार जाते हैं। यही हाल घरवालों का भी होता है। हालांकि, कुछ लोग इस बीमारी से लड़ते हैं और जीतते भी हैं। मुस्कुराकर फिर अपनी स्वस्थ जिंदगी गुजारते हैं, जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो। राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस के अवसर पर आपकी मुलाकात आज ऐसे ही कुछ योद्धाओं से कराते हैं, जिन्होंने लड़कर कैंसर पर जीत हासिल की। ये कोई सेलिब्रिटी नहीं, जो विदेश गए हों और महंगा इलाज करा कर स्वस्थ हुए हों।

यह आपके आसपास के ही आम लोग हैं, जिन्होंने बरेली में ही रहकर एसआरएमएस इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के आरआर कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर में इलाज कराया और जानलेवा समझी जाने वाली बीमारी कैंसर को मात दी। साल 2007 में स्थापित होने के बाद से आरआर कैंसर इंस्टीट्यूट 35 हजार से अधिक कैंसर पीड़ितों का इलाज कर चुका है। यह सेंटर रुहेलखंड रीजन और आसपास के इलाके में एक बड़ा सेंटर बन चुका है, जहां उत्तराखंड और नेपाल तक से मरीज अपना इलाज कराने आते हैं।

कैंसर से डरे नहीं, बस जागरूक रहें

आरआर कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर के डायरेक्‍टर डॉक्‍टर पियूष कुमार अग्रवाल ने कहा कि कैंसर लाइलाज नहीं, बस जागरूकता की कमी से लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है। शुरुआती चरणों में पूरी तरह से इस भयानक बीमारी पर काबू करना संभव है। लेकिन इसकी जांच के लिए बायोप्सी कराने से डरना। रेडियोथेरेपी और कीमोथेरेपी को लेकर गलत धारणाओं से लोग इसके इलाज से बचते हैं। इस लापरवाही से यह बीमारी अंतिम चरण में पहुंच कर लाइलाज हो जाती है। यदि समय से जांच और इलाज कराया जाए। तो इसे प्रारंभिक अवस्था में ही पकड़ा जा सकता है और इसका पूर्ण इलाज संभव है। एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज स्थित आरआर कैंसर इंस्टीट्यूट में आरंभिक चरण में ही सभी प्रकार के कैंसर की पहचान और इसका संभव है। हजारों मरीज यहां से स्वस्थ होकर सामान्य और कैंसर से बेखौफ जीवन बिता रहे हैं।

क्या और क्यों होता है कैंसर?

कैंसर खुद में कोई बीमारी नहीं, बल्कि कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि है, जो शरीर के किसी भी अंग में, कभी भी और किसी भी उम्र हो सकती है। यह वृद्धि एक अंग से होती हुई शरीर के दूसरे भाग को भी प्रभावित कर सकती है। शरीर का न भरने वाला घाव, किसी अंग विशेष में लगातार दर्द, तेजी से बढ़ रही गांठ कैंसर की वजह हो सकती है। हां, हर गांठ कैंसर नहीं होती। अस्वास्थ्यकर खानपान, जीवनशैली और प्रदूषण कैंसर के लिए जिम्मेदार होते हैं। इससे बचाव और जागरूकता कैंसर रोकने में कारगर है।

डराते हैं कैंसर के ये भयावह आंकड़े

  • भारत में प्रति मिनट सर्वाइकल कैंसर से एक एक महिला की मृत्यु।
  • देश में प्रति मिनट दो महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का पता चलता है और एक की मौत हो जाती है।
  • देश में तंबाकू की वजह से मुंह के कैंसर से प्रतिदिन 3500 लोगों की मृत्यु। वर्ष 2018 में कैंसर से कुल 7,84,921 लोगों की मौत।
  • धुएं (बीड़ी, सिगरेट के धुएं सहित) से वर्ष 2018 में 3,17,928 लोगों की मौत।
  • कैंसर से मरने वाले पुरुषों में सबसे ज्यादा 25 फीसद वजह मुंह और फेफड़ों का कैंसर, जबकि महिलाओं में सबसे ज्यादा 25 फीसद वजह मुंह और ब्रेस्ट कैंसर।

भावनात्मक और आर्थिक तनाव भी

वैश्विक रूप से देखें तो बीमारी से होने वाली मौतों में कैंसर दूसरा सबसे बड़ा कारण है। वर्ष 2018 में करीब 96 लाख लोगों की कैंसर से जान गई यानी छह में एक मरीज के निधन की वजह कैंसर बना। फेफड़ा, प्रोस्टेट, कोलोरेक्टल, पेट और लिवर कैंसर से पुरुष ज्यादा प्रभावित हुए। जबकि ब्रेस्ट, कोलोरेक्टल, फेफड़ा और सर्वाइकल कैंसर ने महिलाओं पर ज्यादा असर डाला। तेजी से फैल रही ये बीमारी लोगों को भयभीत करने के साथ परिवारों, समाज और स्वास्थ्य सेवाओं पर असर भी असर डाल रही है। इससे शारीरिक, भावनात्मक और वित्तीय रूप से भी तनाव बढ़ रहा है।

कैंसर को मात देकर जीत हासिल करने वाले ये हैं योद्धा

ऑपरेशन कर निकाली कैंसर वाली गांठ

रामपुर के स्वार निवासी फारुख खान की पत्नी आयशा खान के कंधे पर गांठ थी। आयशा को इलाज के लिए वर्ष 2015 में राममूर्ति अस्पताल लाया गया। यहां जांच के दौरान कैंसर की जानकारी मिली। आपरेशन कर गांठ निकाली गई। इसके बाद दो महीने सिकाई हुई। कैंसर से निजात पाकर आयशा पूरी तरह स्वस्थ और सामान्य जीवन जी रही हैं।

ऑपरेशन से मिली प्रोस्टेट कैंसर से मुक्ति

शाहजहांपुर के कांट निवासी अवधेश कुमार को वर्ष 2017 में पेशाब करने में दिक्कत हुई। इलाज के लिए राममूर्ति अस्पताल पहुंचे। जहां प्रोस्टेट कैंसर की जानकारी मिली। प्रोस्टेट का आपरेशन हुआ। दो महीने सिकाई के बाद अवधेश ने कैंसर को मात दे दी। आज अवधेश पहले की तरह सामान्य दिनचर्या के साथ जीवन यापन कर रहे हैं।

गले में कैंसर का हुआ सफल इलाज

चंपावत निवासी महा सिंह को वर्ष 2015 गले में दिक्कत हुई। हल्द्वानी में इलाज करवाया। काफी दिन इलाज के बाद भी कोई फायदा न होने पर घरवाले उन्हें लेकर राममूर्ति अस्पताल पहुंचे। यहां उन्हें कैंसर की जानकारी मिली। डॉ. पियूष अग्रवाल ने उनका इलाज शुरू किया। कुछ ही महीनों में स्वस्थ महा सिंह आज सामान्य दिनचर्या से जीवन जी रहे हैं।

कैंसर होने से खाने में थी दिक्कत, अब स्वस्थ

बदायूं निवासी महेश चंद्र को वर्ष 2014 में गले में तकलीफ थी। खाना निगलना मुश्किल था। स्थानीय इलाज से कोई फायदा न होने पर वह राममूर्ति अस्पताल के ईएनटी विभाग में पहुंचे। डॉ. रोहित शर्मा ने बायोप्सी की, जिसमें कैंसर की पुष्टि हुई। इसके बाद यहीं कैंसर का इलाज शुरू हुआ। दो महीने में आठ कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी हुई। कैंसर को मात देने के बाद महेश पूरी तरह स्वस्थ हैं।

पेशाब करने में होती थी जलन, कैंसर निकला अब स्वस्थ

आठ साल पहले बिहारीपुर निवासी रानी (73) को पेशाब संबंधी दिक्कतें महसूस हुईं। पेशाब करने में जलन होती थी। निजी अस्पताल में दिखाया गया। वहां कैंसर की पुष्टि हुई। आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के चलते परिवार वालों ने रानी को 13 मार्च 2012 को एसआरएमएस में भर्ती कराया। ऑपरेशन हुआ और फिर पांच हफ्ते सिकाई हुई। आज रानी पूरी तरह स्वस्थ हैं। बीच बीच में जांच के लिए एसआरएमएस जा रही हैं।

खाने पीने में दिक्कत थी, जांच में मुंह का कैंसर निकला

प्राइवेट जाब करने वाले शाहाबाद (हरदोई) निवासी अशोक कुमार अग्निहोत्री (52) को सात साल (वर्ष 2013) पहले खाने-पीने में दिक्कत शुरू हुई। शाहजहांपुर में दिखाया तो बरेली जाने की सलाह दी गई। इस पर एसआरएमएस ले जाया गया। जहां जांच में मुंह के कैंसर की जानकारी मिली। नाम सुन कर ही परिजनों के साथ राजेश भी डर गए। डॉक्टरों ने हौसला दिया। इलाज शुरू हुआ। सिंकाई हुई और कीमो भी। राजेश दो महीने में पूरी तरह स्वस्थ हो गए।

आवाज में आया बदलाव, गले का कैंसर निकला, इलाज के बाद स्वस्थ

किसान श्याम बिहारी (58) को भी सात साल पहले आवाज में बदलाव था और खाने-पीने में दिक्कत थी। पीलीभीत में दिखाया। डॉक्टरों ने राममूर्ति अस्पताल जाने की सलाह दी। राममूर्ति में गले का कैंसर बताया गया। नियमित सिकाई और कीमो की बात डॉक्टरों ने कही। श्याम बिहारी हिम्मत नहीं हारे। कभी परिवार वालों के साथ तो कभी अकेले ही एसआरएमएस आते। सिकाई या कीमो कराते और वापस घर चले जाते। करीब दो महीना इलाज के बाद श्याम बिहारी आज तरह स्वस्थ हैं।

गले का कैंसर था, इलाज के बाद पूरी तरह स्वस्थ

पेशे से फोटोग्राफर अरशद सईद (52) पूरी तरह स्वस्थ थे। नौ साल पहले परिवार वालों और दोस्तों ने इन्हें आवाज बदल जाने की जानकारी दी। चेकअप में गले का कैंसर पता चला। कई लखनऊ सहित कई जगह दिखाया, लेकिन फायदा नहीं हुआ। रिश्तेदारों ने मुंबई ले जाने की सलाह दी। लेकिन वहां ले जाने में तकलीफ और खर्च को देखते हुए अरशद को एसआरएमएस लाया गया। जहां डॉ. पियूष ने हिम्मत दी और ठीक होने का भरोसा दिलाया। चार महीने में अरशद पूर्ण स्वस्थ हो गए।

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