लखनऊ: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दूरदर्शी नीतियों के चलते अब उत्तर प्रदेश, देश के सबसे बड़े ‘डिजिटल पावरहाउस’ के रूप में उभर रहा है। राज्य की डेटा सेंटर नीति ने निवेश के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ते हुए प्रदेश को नई अर्थव्यवस्था और डिजिटल भविष्य का केंद्र बना दिया है। सरकार ने डेटा सेंटर क्षेत्र के लिए अपने लक्ष्यों को कई गुना बढ़ा दिया है।
अब प्रदेश सरकार एक बड़े रोडमैप पर काम कर रही है। पहले 3 डेटा सेंटर पार्क का लक्ष्य था, जिसे अब बढ़ाकर 8 डेटा सेंटर पार्क कर दिया गया है। 30,000 करोड़ रुपये के अनुमानित निवेश के साथ 900 मेगावाट क्षमता विकसित करने का विजन तैयार है। अब तक 21,343 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों को मंजूरी मिल चुकी है, जिसमें 6 डेटा सेंटर पार्क शामिल हैं।
समय से पहले हासिल किए बड़े मुकाम
जनवरी, 2021 में अधिसूचित डेटा सेंटर नीति ने उम्मीद से बेहतर परिणाम दिए हैं। स्वीकृत परियोजनाओं में से 7 इकाइयां पूरी तरह संचालित हो चुकी हैं, जो प्रदेश की डिजिटल क्षमता को बढ़ा रही हैं। फरवरी 2023 के समिट में डेटा सेंटर क्षेत्र के लिए कुल 1.36 लाख करोड़ रुपये के 29 समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर किए गए। लक्ष्यों की समय से पूर्व प्राप्ति को देखते हुए सरकार ने नीति को और अधिक ‘निवेश-अनुकूल’ बनाकर संशोधित किया है।
निवेशकों के भरोसे की वजह
- यूपी में डेटा सेंटर जैसे तकनीक आधारित क्षेत्र में निवेशकों के बढ़ते विश्वास के पीछे तीन मुख्य स्तंभ हैं।
- पारदर्शी शासन व्यवस्था: निवेशकों के लिए सुगम और सरल प्रक्रियाएं।
- मजबूत कानून-व्यवस्था: पूंजी निवेश के लिए सुरक्षित वातावरण।
- बुनियादी ढांचा: बिजली और कनेक्टिविटी की निर्बाध उपलब्धता।
डेटा सेंटर क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
डेटा सेंटर वह भौतिक स्थान (बिल्डिंग) होता है, जहां बड़ी मात्रा में कंप्यूटर सर्वर, स्टोरेज डिवाइस और नेटवर्किंग उपकरण रखे जाते हैं। यह डिजिटल दुनिया का ‘दिमाग’ है। हम इंटरनेट पर जो भी डेटा (फेसबुक, इंस्टाग्राम, बैंकिंग डिटेल्स, सरकारी रिकॉर्ड) एक्सेस करते हैं, वह इन्हीं डेटा सेंटर्स में सुरक्षित रहता है। यूपी सरकार चाहती है कि दुनिया भर का डेटा उत्तर प्रदेश की धरती पर सुरक्षित रहे।
नीति का विकास: 2021 से 2026 तक का सफर
सरकार ने छोटे लक्ष्य के साथ शुरुआत (जनवरी 2021) में की थी। जिसमें केवल 3 डेटा सेंटर पार्क और 250 मेगावाट बिजली क्षमता थी। निवेशकों ने इतनी रुचि दिखाई कि ये लक्ष्य मात्र एक साल में पूरे हो गए। सफलता को देखते हुए योगी सरकार ने नीति में बदलाव किया और अब लक्ष्य को तीन गुना बढ़ाकर 900 मेगावाट और 8 डेटा सेंटर पार्क कर दिया है।
अब तक 21,343 करोड़ रुपये के निवेश को हरी झंडी मिल चुकी है। यह केवल कागजों पर नहीं है, बल्कि इसमें से 7 परियोजनाएं पूरी तरह संचालित (Operational) हो चुकी हैं। फरवरी 2023 में हुए निवेश सम्मेलन ने इसे वैश्विक पहचान दी। अकेले इस क्षेत्र के लिए 1.36 लाख करोड़ रुपये के एमओयू (MoU) साइन हुए, जो दिखाते हैं कि बड़ी कंपनियां यूपी को ‘सेफ’ मान रही हैं।
उत्तर प्रदेश ही निवेशकों की पहली पसंद क्यों?
डेटा सेंटर को चलाने के लिए तीन चीजों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, जो यूपी सरकार उपलब्ध करा रही है। डेटा सेंटर 24×7 चलते हैं, इसलिए सरकार बिजली ग्रिड और ओपन एक्सेस बिजली की सुविधा दे रही है।
नोएडा और ग्रेटर नोएडा जैसे इलाके फाइबर ऑप्टिक केबल और एक्सप्रेसवे से लैस हैं। सरकार डेटा सेंटर बनाने के लिए जमीन खरीदने पर स्टाम्प ड्यूटी में छूट, बिजली बिल में सब्सिडी और पूंजीगत सब्सिडी (Capital Subsidy) दे रही है।
डिजिटल इंडिया और भविष्य का विजन
अभी तक भारत में डेटा सेंटर्स का बड़ा केंद्र मुंबई या चेन्नई जैसे तटीय शहर थे। यूपी की नीति ने उत्तर भारत को, विशेषकर दिल्ली-एनसीआर (नोएडा) को डिजिटल निवेश का नया केंद्र बना दिया है। यह केवल मशीनों का खेल नहीं है। इन पार्कों के निर्माण और संचालन से आईटी प्रोफेशनल्स, इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स और मेंटेनेंस स्टाफ के लिए हजारों उच्च-स्तरीय नौकरियों के अवसर पैदा हो रहे हैं।