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Ghooskhor Pandat पर बवाल, अब FWICE ने खोला मोर्चा; टाइटल को बताया ‘अपमानजनक’

Ghooskhor Pandat पर बवाल, अब FWICE ने खोला मोर्चा; टाइटल को बताया 'अपमानजनक'

Ghooskhor Pandat Controversy: मनोज बाजपेयी स्टारर ‘घूसखोर पंडत’ रिलीज से पहले ही विवादों में फंस चुकी है और ये विवाद अब विकराल रूप लेता जा रहा है। फिल्म के खिलाफ पहले ही दो एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं, लीगल नोटिस भी जारी हो चुके हैं और केंद्र ने भी फिल्म के टाइटल को लेकर सख्ती अपनाई है। फिल्म के टीजर और अन्य प्रमोशनल कंटेंट को तत्काल प्रभाव से यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से हटाने के निर्देश दिए गए हैं। जिसके बाद नेटफ्लिक्स ने यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से ‘घूसखोर पंडत’ का टीजर हटा दिया है। इस बीच द फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉइज (FWICE) ने भी फिल्म के टाइटल को लेकर नाराजगी जाहिर की है।

फिल्म के टाइटल पर आपत्ति

FWICE ने निर्देशक नीरज पांडे की अपकमिंग फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ के टाइटल पर कड़ी आपत्ति जताई है और चेतावनी दी है कि इस तरह के टाइटल और कंटेंट से सामाजिक सद्भाव बिगड़ सकता है और सामुदायिक भावनाओं को ठेस पहुंच सकती है। FWICE ने एक औपचारिक विज्ञप्ति जारी करते हुए, फिल्म निर्माता संघों और ओटीटी प्लेटफॉर्मों से आग्रह किया है कि वे ऐसे टाइटल्स का रजिस्ट्रेशन करने से बचें जिन्हें वह उत्तेजक या आपत्तिजनक मानती है।

FWICE ने जताई नाराजगी

FWICE ने फिल्म के टाइटल पर नाराजगी जाहिर करते हुए लिखा- ‘इंडस्ट्री के वर्कर्स, टेक्नीशियन्स और कलाकारों सहित 36 संबद्ध संघों और सैकड़ों सदस्यों का प्रतिनिधित्व करने वाला फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉइज़ (FWICE), नीरज पांडे द्वारा अपने बैनर फ्राइडे फिल्मवर्क्स के तहत निर्मित विवादास्पद फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ के संबंध में गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए आपको यह पत्र लिख रहा है। FWICE और इसके सभी संबद्ध संगठन इस टाइटल के प्रयोग का कड़ा विरोध करते हैं, क्योंकि यह एक विशिष्ट समुदाय और उसकी पारंपरिक आजीविका को अपमानजनक और आपत्तिजनक तरीके से निशाना बनाता प्रतीत होता है। इस तरह के टाइटल भावनाओं को ठेस पहुंचा सकते हैं, गलतफहमी पैदा कर सकता है और सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ सकता है।’

जातिधर्म के आधार पर करें समाज का बंटवारा– FWICE

FWICE ने आगे लिखा- ‘FWICE मानना है कि समाज में जाति, पंथ, धर्म या पेशे के आधार पर कोई विभाजन नहीं होना चाहिए। सभी पेशे समान रूप से गरिमामय और सम्मान के पात्र हैं। फिल्म उद्योग, अभिव्यक्ति का एक शक्तिशाली माध्यम होने के नाते, यह सुनिश्चित करने के लिए नैतिक और सामाजिक रूप से उत्तरदायी है कि इसकी सामग्री और शीर्षक नागरिकों के बीच घृणा, अनादर या अशांति को बढ़ावा न दें।’

 

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