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उन्नाव दुष्‍कर्म केस: कुलदीप सेंगर की जमानत पर ‘सुप्रीम’ रोक, चार हफ्ते बाद अगली सुनवाई

उन्नाव दुष्‍कर्म केस: कुलदीप सेंगर की जमानत पर ‘सुप्रीम’ रोक, चार हफ्ते बाद अगली सुनवाई

नई दिल्‍ली: उन्नाव दुष्‍कर्म केस में आरोपी पूर्व बीजेपी विधायक कुलदीप सेंगर की जमानत पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (29 दिसंबर) को सुनवाई करते हुए रोक लगा दी है। अदालत ने सेंगर को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा। मामले में चार हफ्ते बाद सुनवाई होगी। सेंगर को दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 दिसंबर को जमानत दी थी। जमानत के खिलाफ CBI ने सुप्रीम कोर्ट में 3 दिन पहले याचिका लगाई थी। सुनवाई से पहले पीड़ित के समर्थन में प्रदर्शन कर रहीं महिला कांग्रेस कार्यकर्ताओं की पुलिस से झड़प हो गई। पुलिस उन्हें जीप में बैठाकर ले गई।

सोमवार को चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच में सुनवाई हुई। बेंच ने दोनों पक्षों की करीब 40 मिनट तक दलीलें सुनीं। चीफ जस्टिस ने कहा, कोर्ट को लगता है कि मामले में महत्वपूर्ण सवालों पर विस्तार से विचार जरूरी है। आमतौर पर कोर्ट का सिद्धांत है कि किसी दोषी या विचाराधीन कैदी को रिहा कर दिया गया हो, तो बिना उसे सुने ऐसे आदेशों पर रोक नहीं लगाई जाती। लेकिन इस मामले में परिस्थितियां अलग हैं। क्योंकि आरोपी दूसरे मामले में पहले से दोषी ठहराया जा चुका है। ऐसे में दिल्ली हाईकोर्ट के 23 दिसंबर 2025 के आदेश पर रोक लगाई जाती है।

आदेश पर योगिता भैयाना बोलीं– सत्यमेव जयते, हमें ऐसी ही उम्मीद थी

महिला एक्टिविस्ट योगिता भयाना ने कहा, “सत्यमेव जयते। हमें इस फैसले की उम्मीद थी। हम इसके लिए सुप्रीम कोर्ट और सभी मीडिया का धन्यवाद करते हैं। सुप्रीम कोर्ट इस मामले को लेकर संवेदनशील रहा है। यह न्याय की बहुत ही बेसिक बात थी। इससे देश की बेटियों को यह मैसेज जाएगा कि अगर उनके साथ अन्याय होता है, तो उन्हें न्याय मिलेगा।”

पीड़ित के वकील ने कहा– आरोपी किसी भी हाल में जेल से रिहा नहीं होगा

पीड़ित पक्ष के वकील हेमंत कुमार मौर्य ने कहा, सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों को एक सख्त आदेश जारी किया है कि आरोपी को किसी भी हालत में जेल से रिहा नहीं किया जाएगा। राहत देने वाले आदेश पर रोक लगा दी गई है। विपक्ष को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए समय दिया गया है, और तब तक, उसे किसी भी हालत में जेल से रिहा नहीं किया जाएगा। यह सुप्रीम कोर्ट का आदेश है, और हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी गई है।

कांग्रेस नेता मुमताज पटेल बोलीं– उम्मीद की किरण दिखी

कांग्रेस नेता मुमताज पटेल ने कहा, “इस आदेश से उम्मीद की किरण दिखी। हम चाहते हैं कि बच्ची को न्याय मिले। अब लगता है कि हम उस दिशा में हैं। हर बलात्कारी को फांसी की सजा मिलनी चाहिए।”

अंतरात्मा की आवाज सुनकर HC के आदेश पर रोक लगाए SC: सॉलिसिटर जनरल

सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, पॉक्सो अधिनियम की धारा 42A पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इस धारा में साफ लिखा है कि अगर पॉक्सो कानून और किसी दूसरे कानून के बीच टकराव हो, तो पॉक्सो कानून को प्राथमिकता दी जाएगी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में इस पहलू पर विचार ही नहीं किया। उन्‍होंने कहा कि ये भयावह मामला है। धारा-376 और पॉक्सो के तहत आरोप तय हुए थे। ऐसे मामलों में न्यूनतम सजा 20 साल की कैद हो सकती है, जो पूरी उम्र की जेल तक बढ़ाई जा सकती है।

SG ने आगे अदालत को यह भी बताया कि इस मामले में आरोपी को पीड़ित के पिता की हत्या के अपराध में भी दोषी ठहराया जा चुका है। वह उस मामले में अभी भी जेल में है। वह अदालत की अंतरात्मा से अनुरोध करते हैं कि पीड़ित बच्ची के हित में हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाई जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा– हाईकोर्ट के 23 दिसंबर के आदेश पर रोक लगाई जाती है

सुप्रीम कोर्ट ने कुलदीप सेंगर की फैसले पर रोक लगा दी है। CJI ने कहा कि कोर्ट को लगता है कि मामले में महत्वपूर्ण सवालों पर विस्तार से विचार जरूरी है। आम तौर पर कोर्ट का सिद्धांत है कि किसी दोषी या विचाराधीन कैदी को रिहा कर दिया गया हो, तो बिना उसे सुने ऐसे आदेशों पर रोक नहीं लगाई जाती। लेकिन इस मामले में परिस्थितियां अलग हैं। क्योंकि आरोपी दूसरे मामले में पहले से दोषी ठहराया जा चुका है। ऐसे में दिल्ली हाईकोर्ट के 23 दिसंबर 2025 के आदेश पर रोक लगाई जाती है।

हाईकोर्ट के आदेश पर कड़ी टिप्पणी

न्यायमूर्ति जेके महेश्वरी ने सवाल उठाया कि हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह साफ तौर पर कहा भी है या नहीं कि अभियुक्त धारा 376(2)(i) के तहत दोषी है या नहीं।

इस पर वकील हरीहरन ने दलील दी कि किसी दंडात्मक कानून (पीनल स्टैच्यूट) में दूसरे कानून से परिभाषा उधार लेकर लागू नहीं की जा सकती। लेकिन न्यायमूर्ति महेश्वरी ने स्पष्ट किया कि अदालत फिलहाल केवल एक ही बात देख रही है। उन्होंने कहा- ट्रायल कोर्ट के आदेश को देखिए। उसके पैरा 14 में इस सवाल का जवाब मौजूद है। वहां साफ तौर पर धारा 376(2)(i) के तहत दोष सिद्ध किया गया है।

न्यायमूर्ति ने आगे पूछा कि हाईकोर्ट के सजा निलंबन (सस्पेंशन) के आदेश में इस बिंदु पर कहां विचार किया गया है। बस यही दिखाइए कि हाईकोर्ट ने अपने आदेश में धारा 376(2)(i) के इस पहलू को कहां और कैसे देखा है।

CJI बोले- गलती किसी भी जज से हो सकती है

CJI ने कहा कि इस मामले में एक गंभीर कानूनी सवाल है, जिस पर विचार जरूरी है। हाईकोर्ट का आदेश जिन जजों ने दिया है, वे देश के बेहतरीन जजों में गिने जाते हैं, लेकिन गलती किसी से भी हो सकती है। पॉक्सो कानून में ‘लोक सेवक’ की परिभाषा को लेकर अदालत चिंतित है। ऐसा कैसे हो सकता है कि इस कानून के तहत एक पुलिस कांस्टेबल को लोक सेवक माना जाए, लेकिन किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि, जैसे विधायक या सांसद, को इस दायरे से बाहर कर दिया जाए। अदालत को यह असमानता परेशान कर रही है।

वकील हरीहरन ने आपत्ति जताते हुए कहा कि क्या यह एक तरह का मीडिया ट्रायल नहीं बनता जा रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में सत्ता के पृथक्करण (सेपरेशन ऑफ पावर्स) का सिद्धांत लागू होता है और अदालत को उसकी सीमाओं में रहना चाहिए। वकील डेव ने भी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस मामले में जजों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर घूम रही हैं, जो एक चिंताजनक स्थिति है।

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