बरेली: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर जनरल कैटेगरी के छात्रों में असंतोष है। वहीं, प्रयागराज में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़ा घटनाक्रम भी सुर्खियों में है। इन्हीं घटनाओं को जोड़ते हुए बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपने इस्तीफे के पीछे दो प्रमुख कारण बताए हैं। इनमें पहला है- UGC के हालिया नियम, जिन्हें वह जनरल कैटेगरी या सवर्ण समाज के छात्रों के अधिकारों के खिलाफ मानते हैं।
अलंकार अग्निहोत्री ने दूसरे कारण में प्रयागराज में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों के साथ कथित तौर पर हुई बदसलूकी है, जिसमें उनकी चोटी खींचे जाने का आरोप लगाया गया है। अग्निहोत्री का कहना है कि ये दोनों घटनाएं केवल प्रशासनिक या शैक्षणिक निर्णय नहीं हैं, बल्कि समाज के एक बड़े वर्ग की गरिमा और अधिकारों से जुड़ी हुई हैं।
इस्तीफा भेजने के बाद कही ये बात
इस्तीफा भेजने के बाद अलंकार अग्निहोत्री ने कहा कि यह कदम उन्होंने ब्राह्मण समाज के अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए उठाया है। उन्होंने कहा कि प्रशासन के मौन रवैये और नेताओं की चुप्पी ने समाज के विश्वास को झकझोर दिया है। उन्होंने सभी ब्राह्मण सांसदों और विधायकों से तत्काल इस्तीफा देने और जनता के साथ खड़े होने की अपील की है। उनका कहना है कि यह नियम एकतरफा हैं और छात्रों के करियर और व्यक्तिगत जीवन को जोखिम में डाल सकते हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि समाज के जनप्रतिनिधि इस मामले पर चुप हैं और मौन रहकर उच्च वर्ग के छात्रों के अधिकारों का हनन कर रहे हैं। ब्राह्मण नेताओं की इस चुप्पी पर अग्निहोत्री ने कटाक्ष किया कि वे किसी कॉर्पोरेट कंपनी के कर्मचारियों की तरह आदेश मिलने का इंतजार कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि नेता जनता और समाज के साथ नहीं खड़े होते, तो भविष्य में उनकी चुनावी संभावनाएं भी प्रभावित होंगी।

जनता और समाज के साथ खड़ा होना चाहिए
अलंकार अग्निहोत्री ने कहा कि यह समय सामान्य वर्ग के लिए निर्णायक है और अब उन्हें सरकार और सत्ता के साथ नहीं, बल्कि जनता और समाज के साथ खड़ा होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया और देशभर में जारी प्रदर्शन इस मानसिक और सामाजिक असंतोष का प्रमाण हैं।
#बरेली– अलंकार अग्निहोत्री कानपुर IIT के पास आउट है. 2016 बैच के PCS अफसर है. अग्निहोत्री साहब की ईमानदारी के चर्चे विभाग में होते है. बेहद सुलझे व्यक्ति है. DM के आदेश पर 4 ADM और 2 SDM उन्हें समझाने पहुंचे है. बंद कमरे में वार्ता जारी है. वार्ता से कुछ मिनट पहले का बयान सुनिए https://t.co/IlpcvH7CmN pic.twitter.com/6Ml9U46bsg
— Narendra Pratap (@hindipatrakar) January 26, 2026
क्या है UGC का नया नियम?
UGC द्वारा हाल ही में लागू किए गए नए नियमों के तहत देश के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में Equal Opportunity Centre, Equity Committee, 24×7 हेल्पलाइन और Equity Squads का गठन अनिवार्य किया गया है। यूजीसी का दावा है कि इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों के खिलाफ होने वाले जातिगत भेदभाव को रोकना और उस पर प्रभावी निगरानी रखना है। आयोग के मुताबिक, यदि कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता है, तो उसकी मान्यता रद्द की जा सकती है या फंडिंग रोकी जा सकती है।
UGC के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2020 से 2025 के बीच भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में 100 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों के बाद सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों को भी इन नियमों के पीछे एक अहम वजह बताया जा रहा है। आयोग का मानना है कि बिना ठोस निगरानी व्यवस्था के कैंपस में समानता और सुरक्षित माहौल सुनिश्चित नहीं किया जा सकता।
छात्रों ने लगाया ये आरोप
हालांकि, जनरल कैटेगरी के छात्रों और उनसे जुड़े संगठनों का नजरिया इससे बिल्कुल अलग है। उनका कहना है कि ये नियम एकतरफा हैं और सभी वर्गों के हितों को समान रूप से नहीं देखते। छात्रों का आरोप है कि ड्राफ्ट नियमों में ‘झूठी शिकायत’ पर कार्रवाई का जो प्रावधान था, उसे अंतिम नियमों से हटा दिया गया। इससे यह आशंका बढ़ गई है कि किसी भी छात्र या शिक्षक पर बिना ठोस सबूत के भेदभाव का आरोप लगाया जा सकता है, जिसका सीधा असर उसके शैक्षणिक भविष्य और करियर पर पड़ सकता है। विरोध कर रहे छात्रों का यह भी कहना है कि Equity Committees में जनरल कैटेगरी के प्रतिनिधित्व को अनिवार्य नहीं किया गया है।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का मुद्दा भी गरमाया
दूसरी ओर प्रयागराज में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन के बीच जारी विवाद ने भी सियासी रंग पकड़ लिया है। माघ मेला क्षेत्र में उनके शिविर को लेकर प्रशासन और संत समाज के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है। प्रशासन की ओर से उन्हें नोटिस भेजा गया है और उनके शंकराचार्य पद को लेकर भी सवाल खड़े किए गए हैं। इस पर विपक्षी दल यूपी सरकार पर लगातार हमलावर हैं।