बरेली: श्रीराम मूर्ति स्मारक रिद्धिमा में रविवार (30 नवंबर) को मुशायरे की शाम बज़्म-ए-सुखन की 5वीं महफिल सजी। इसमें उभरते युवा शायर मजहर (रामपुर), शायरा तरन्नुम निशात (नैनीताल), शायरा जीनत मुरादाबादी (मुरादाबाद), राशिद राहत (मुरादाबाद), आकिल जैतपुरी (मुरादाबाद), डॉ. अदनान काशिफ (बरेली) ने कलाम पढ़े।
आकिल जैतपुरी ने ‘क्या मिला तुझको बता उसकी तमन्ना करके, ऐ जूनूं तूने मुझे छोड़ा तमाशा करके, ये अलग बात कि दिल जल गया आकिल का, मगर देख राहों में तेरी छोड़ा उजाला करके’ पढ़ कर कार्यक्रम का आगाज किया। जीनत मुरादाबादी ने ‘सब के लिए अमान हूं मैं वो जहान हूं, पहचान मेरी उर्दू है, हिंदुस्तान हूं’, सुनाकर वतन से मुहब्बत का ऐलान किया। राशिद राहत ने ‘सारी दुनिया से अलग है ये फसाना मेरा, मैं जमाने का नहीं हूं, ना जमाना मेरा’, सुनाया। तरन्नुम निशात ने ‘ना रो रो कर ना अब घुट घुट के मरना चाहती हूं मैं, धुंधल के मंजरों में रंग भरना चाहती हूं मैं, मैं औरत हूं, मुझे घर से निकलने की इजाज़त दो, जमाने में बहुत कुछ कर गुजरना चाहती हूं मैं’, सुनाकर महिलाओं के सशक्तिकरण की आवाज को स्वर दिए।
इन्होंने भी बांधा समां
शायर मजहर ने ‘मत ढूंढ अपने कत्ल का सामान इधर-उधर, अपनी ही आस्तीन में खंजर तलाश कर, तूने बहुत मजाक उड़ाया है इश्क का, अब अपने सर के वास्ते पत्थर तलाश कर’ सुनाकर इश्क की तरफदारी की और इसे दुनिया के लिए जरूरी बताया। डॉ. अदनान काशिफ ने ‘कितना आसान है किनारे से समंदर देखना, किस कदर दुश्वार है तह में उतर कर देखना, अपने सर की जुस्तजू में कोई पत्थर देखना, रोज का मामूल है ये मेरा ये मंजर देखना’, सुनाकर कद्रदानों की वाहवाही बटोरी। बज़्म-ए-सुखन का संचालन सीईटी के असिस्टेंट प्रोफेसर फरदीन अहमद खान ने किया।
इस मौके पर एसआरएमएस ट्रस्ट के संस्थापक व चेयरमैन देव मूर्ति, आशा मूर्ति, आदित्य मूर्ति, ऋचा मूर्ति, उषा गुप्ता, देविशा मूर्ति, डॉ. प्रभाकर गुप्ता, डॉ. अनुज कुमार, डॉ. शैलेश सक्सेना, अश्विनी चौहान, डॉ. रीता शर्मा, डॉ. आशीष कुमार सहित शहर के गणमान्य लोग मौजूद रहे।