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जरूरत से ज्यादा ‘चंचल’ है आपका बच्चा, एडीएचडी की हो सकती है समस्या

जरूरत से ज्यादा ‘चंचल’ है आपका बच्चा, एडीएचडी की हो सकती है समस्या
  • -अटेंशन डिफीसिटएट हाइपरएक्टिव डिसऑर्डर से बच्चे ही नहीं वयस्क भी हैं परेशान

  • -बड़े परदे के मशहूर सितारे हैं एडीएचडी का शिकार, जागरूकता से करना होगा इस पर वार

अभिषेक पाण्डेय/लखनऊ। हाल ही में बॉलीवुड इंडस्ट्री की मशहूर एक्ट्रेस आलिया भट्ट का एक इंटरव्यू काफी सुर्खियों में रहा। वैसे तो इस इंटरव्यू में आलिया ने अपनी फिल्म ‘जिगरा’ का प्रमोशन किया था, लेकिन इस इंटरव्यू में उन्होंने खुलासा किया था कि उन्हें एक रेयर डिसऑर्डर है। अभिनेत्री ने इस इंटरव्यू में बताया था कि वे बचपन से ही अटेंशन डिफीसिटएट हाइपरएक्टिव डिसऑर्डर यानी एडीएचडी से ग्रसित हैं। उन्होंने बताया कि इस बीमारी के चलते वो 45 मिनट से ज्यादा देर तक मेकअप चेयर पर नहीं बठ सकतीं।

वहीं, दूसरी ओर मलयालम फिल्म इंडस्ट्री के सबसे महंगे एक्टर्स में से एक फहाद फाजिल ने भी बताया था कि वह एडीएचडी नामक एक डिसऑर्डर से ग्रस्त हैं, जोकि आमतौर पर बचपन में होता, लेकिन उन्हें 41 की उम्र में इसका सामना करना पड़ रहा है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर ये डिसऑर्डर है क्या, जिसकी चपेट में बड़े परदे के कई बड़े चेहरे हैं? क्या इसका कोई इलाज है? इसके लक्षण क्या हैं? इससे बचाव कैसे किया जा सकता है? इन सब सवालों को लेकर माई नेशन ब्यूरो चीफ अभिषेक पाण्डेय ने लखनऊ की मशहूर मनोचिकित्सक, ट्राइडेंट न्यूरोसाइकियाट्रिक हॉस्पिटल और रिहैबिलिटेशन सेंटर की निदेशक डॉ. पारुल प्रसाद से खास बातचीत की है। इस बातचीत के प्रमुख अंश इस रिपोर्ट में पढ़िए…

 

 

 

अटेंशन डिफीसिटएट हाइपरएक्टिव डिसऑर्डर से बच्चे ही नहीं वयस्क भी हैं परेशान

मनोचिकित्सक डॉ. पारुल प्रसाद , निदेशक, ट्राइडेंट न्यूरोसाइकियाट्रिक हॉस्पिटल और रिहैबिलिटेशन सेंटर

 

सवाल: एडीएचडी क्या है? क्यों आजकल ये चर्चा में है?

जवाब: अटेंशन डिफीसिटएट हाइपरएक्टिव डिसऑर्डर यानी एडीएचडी एक न्यूरो डेवलेपमेंटल स्थिति है। इस स्थिति से हर साल लाखों बच्चे प्रभावित होते हैं। एडीएचडी में लगातार होने वाली समस्याओं का संयोजन शामिल है, जैसे कि ध्यान बनाए रखने में कठिनाई और हाइपरएक्टिव रहना। कुछ मामलों में एडीएचडी वाले बच्चे कम आत्मसम्मान, परेशान रिश्तों और स्कूल में खराब प्रदर्शन से भी जूझ सकते हैं। कभी-कभी उम्र के साथ लक्षण कम हो जाते हैं। हालांकि, कुछ लोग एडीएचडी लक्षणों से पूरी तरह से उबर नहीं पाते हैं।

काम या खेल में ध्यान केंद्रित करने में परेशानी होना, सीधे बात करने पर भी ध्यान न देना, निर्देशों का पालन करने में कठिनाई होना और काम पूरा न कर पाना, कुछ दैनिक गतिविधियां करना भूल जाना, जैसे कि काम करना भूल जाना, हाथों या पैरों से बेचैनी महसूस करना या थपथपाना, लगातार चलते रहना, लगातार गति में रहना, शांत होकर खेलना या कोई गतिविधि करने में परेशानी होना, अपनी बारी का इंतजार करने में कठिनाई होना आदि जैसे लक्षण सामान्य हैं। यहां सबसे ज्यादा ध्यान देने वाली बात ये है कि बच्चों में अत्यधिक चंचलता होना।

सवाल: चंचलता डिसऑर्डर के रूप में कैसे तब्दील हो जाती है? इसको कैसे समझा जाए

जवाब: ये सही है कि इस इस डिसऑर्डर को समझना थोड़ा मुश्किल है। अभिभावकों को हमेशा लगता है कि ये कोई लक्षण नहीं है, ये तो सिर्फ शैतानियां हैं। लेकिन, आपको यह समझना होगा कि शैतानियां सिर्फ एक हद तक होती हैं, जब शैतानियों का स्तर बढ़ जाता है तो वहां कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर होती है। उदाहरण के तौर पर, स्कूल से लगातार शिकायतें आना कि बच्चा एक जगह पर नहीं बैठ रहा है, होमवर्क नहीं कर रहा है, क्लास वर्क नहीं पूरा हो रहा है, एक्टिविटीज को अधूरा छोड़ रहा है… इस तरह की बातें लगातार सुनने को मिलती हैं तो यह जरूरी है कि इसपर ध्यान दिया जाए।

इसके अलावा, एडीएचडी से ग्रसित बच्चे को घर पर भी मैनेज करना हद से ज्यादा मुश्किल हो जाता है। वो कहते हैं न कि ध्यान हटा और दुर्घटना घटी…एडीएचडी से ग्रसित बच्चों पर यह कहावत सटीक बैठती है। क्योंकि, बच्चे से जरा भी ध्यान हटते ही बच्चा खुद को भी नुकसान पंहुचा सकता है। और इसकी वजह है उसकी चंचलता।

सवाल: इस डिसऑर्डर और शुगर के बीच क्या कनेक्शन है?

जवाब: कैंडीज, सॉफ्टी, आईसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक्स में हाई मात्रा में शुगर होती है, जो बच्चों के एनर्जी लेवल को प्रभावित करती है। इसकी वजह से बच्चे बहुत ज्यादा एक्टिव हो जाते हैं। वहीं, इन सारे फूड्स से दूसरी बीमारियां डायबिटीज, मोटापा और दांत में कैविटी लगने की समस्या हो सकती है। वहीं, ज्यादा मात्रा में कार्बोहाइड्रेट भी एडीएचडी की समस्या को बिल्कुल बिगाड़ देता है। केक, पेस्ट्री जैसे फ्रोस्टिंग डेजर्ट में शुगर आर्टीफिशियल कलर काफी ज्यादा मात्रा में होते हैं। इससे बच्चे को हाइपर एक्टीविटी और एडीएचडी के लक्षण पैदा हो सकते हैं।

सवाल: एडीएचडी का ट्रीटमेंट कैसे होता है? क्या आपके सेंटर में इसके उपचार की कोई सुविधा है?

जवाब: इस स्थिति में बच्चे पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होती है। बच्चे को ऐसे कामों में लगाएं, जहां वो एकाग्र हो। ऐसे बच्चों से ज्यादा से ज्यादा बात करें। उन्हें सही डायरेक्शन दें। आप काफी हद तक अपने व्यवहार में बदलाव कर इन बच्चों को ठीक कर सकते हैं। एडीएचडी के गंभीर मामलों में थेरेपी की मदद ली जा सकती है। माइल्ड, मॉडरेट या सीवियर…ये तीन कंडीशंस हैं, पेशंट का उपचार कंडीशन पर निर्भर करता है। माइल्ड कंडीशन में थेरेपी और पैरेंटल गाइडेंस की मदद से काफी हद तक पॉजिटिव रिजल्ट पाया जा सकता है। सीवियर कंडीशन में काउंसलिंग, थेरेपी, मेडिकेशन आदि से डिसऑर्डर को मैनेज किया जाता है।

वहीं, ट्राइडेंट एडवांस सेंटर फॉर चाइल्ड डेवलपमेंट एंड रिहैबिलिटेशन एक ऐसा सेंटर है, जहां 24*7 प्रोफेशनल्स की टीम उपलब्ध रहेगी। इस सेंटर में प्रोफेशनल ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट, बेहविरियल थेरापिस्ट, चाइल्ड साइकोलोजिस्ट, मनोचिकित्सक आदि मौजूद रहेंगे, जिसका फायदा यह होगा कि मरीज और उसके तीमारदार ‘रेफेर पॉलिसी’ के चक्कर से बच जाएंगे, उन्हें एक ही छत के नीचे सम्पूर्ण समाधान मिलेगा। ये लखनऊ का पहले डेडिकेटेड सेंटर हैं, जहां एक छत के नीच कई सुविधाएं मौजूद हैं।

अटेंशन डेफिसिट डिसऑर्डर के कारण

  • -इसके लिए जेनेटिक्स कारण भी जिम्मेदार होते हैं। एडीएचडी पारिवारिक इतिहास वाले बच्चे विकार विकसित करने की अधिक संभावना रखते हैं।

  • -न्यूरोलॉजिकल कारक भी जिम्मेदार हो सकते हैं। इस बीमारी वाले व्यक्तियों के मस्तिष्क की संरचना और कार्य में विभिन्नताएं होती हैं। यह विभिन्नताएं अक्सर उन क्षेत्रों को प्रभावित करती है, जो ध्यान नियंत्रण जैसे कार्यों से संबंधित होते हैं।

  • -पर्यावरणीय कारक भी जिम्मेदार होते हैं। गर्भावस्था के दौरान शुरुआती जीवन में कई ऐसे कारक होते हैं, जो एडीएचडी के विकास के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। इनमें मां का धूम्रपान या शराब का सेवन करना शामिल है।

  • -मनोसामाजिक कारण भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। तनावपूर्ण पारिवारिक वातावरण और प्रतिकूल बचपन के अनुभव एडीएचडी लक्षणों को बढ़ा सकते हैं।

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