प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा भेज दिया है। 14 मार्च, 2025 को उनके दिल्ली स्थित घर में लगी आग में 500-500 के नोटों के बंडल जले मिले थे। इस विवाद के बाद उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर कर दिया गया था।
जस्टिस वर्मा ने 05 अप्रैल, 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में शपथ ली थी। हालांकि, उन्हें कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई थी। जब तक उनके खिलाफ चल रही जांच पूरी नहीं हो जाती, उन्हें न्यायिक कामों से दूर रखा गया था। जस्टिस वर्मा ने राष्ट्रपति को इस्तीफा कब भेजा, अभी पता नहीं चला है। मगर, मीडिया में जानकारी शुक्रवार को आई।
One year after cash-at-home row, Allahabad HC Judge Yashwant Varma resigns, probe continues
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— ANI Digital (@ani_digital) April 10, 2026
महाभियोग प्रस्ताव लाया गया
कैश कांड में नाम आने के बाद जस्टिस वर्मा के खिलाफ लोकसभा में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। उन्होंने अपने खिलाफ लाए गए महाभियोग प्रस्ताव को चुनौती दी थी। याचिका में कहा था कि दोनों सदनों में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था, लेकिन राज्यसभा ने उसे मंजूर नहीं किया। इसके बावजूद लोकसभा ने अकेले जांच समिति बना दी, जो उनके अनुसार गलत है। फिर इसी साल 6 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जांच समिति के गठन में कुछ खामियां दिखाई देती हैं।
हालांकि, कोर्ट यह देखेगा कि क्या यह खामी इतनी गंभीर है कि पूरी कार्यवाही को रद्द किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने 8 जनवरी को जस्टिस वर्मा की याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने दो दिन की सुनवाई के बाद यह निर्णय लिया। हालांकि बेंच ने जस्टिस वर्मा को पार्लियामेंट्री कमेटी के सामने जवाब दाखिल करने के लिए समय बढ़ाने से मना कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने संसदीय जांच पैनल में खामी बताई
इससे पहले 07 जनवरी को कोर्ट ने कहा था कि लोकसभा स्पीकर की ओर से गठित संसदीय जांच पैनल में कुछ खामी दिखाई देती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जजेज इन्क्वायरी एक्ट के तहत लोकसभा स्पीकर के पास यह अधिकार है कि वह जस्टिस वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए समिति गठित कर सकें, भले ही राज्यसभा में ऐसा ही प्रस्ताव खारिज हो चुका हो।