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बंगाल SIR में गड़बड़ी वाले 1.25 करोड़ नाम सार्वजनिक करने का निर्देश, SC बोला- पारदर्शी रहे जांच

बंगाल SIR में गड़बड़ी वाले 1.25 करोड़ नाम सार्वजनिक करने का निर्देश, SC बोला- पारदर्शी रहे जांच

नई दिल्‍ली: देश की सर्वोच्‍च न्‍यायालय यानी सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (19 जनवरी) को पश्चिम बंगाल के 1.25 करोड़ मतदाताओं को अपना नाम वोटर लिस्ट में जुड़वाने के लिए एक और मौका दिया। कोर्ट ने कहा कि वे 10 दिन में अपने डॉक्यूमेंट्स चुनाव आयोग को पेश करें।

चुनाव आयोग ने राज्य में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान नाम, सरनेम, आयु में गड़बड़ी की वजह 1.25 करोड़ वोटर्स को लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी नोटिस जारी किया था। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग गड़बड़ी वाली वोटर लिस्ट ग्राम पंचायत भवन, ब्लॉक कार्यालय और वार्ड कार्यालय में सार्वजनिक लगाए, जिससे लोगों को पता चल सके।

चुनाव आयोग लिस्ट को सार्वजनिक करे

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को उन सभी लोगों की लिस्ट सार्वजनिक करनी होगी, जिन्हें लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी के नाम पर नोटिस भेजा गया है। यह लिस्ट पंचायत और ब्लॉक कार्यालयों में लगाई जाएगी। जिन लोगों को नोटिस मिला है, वे अपने दस्तावेज और आपत्ति खुद या अपने प्रतिनिधि (Booth Level Agent – BLA) के जरिए जमा कर सकते हैं। इसके लिए प्रतिनिधि को एक पत्र देना होगा, जिस पर हस्ताक्षर या अंगूठा लगा हो।

पंचायत भवन या ब्लॉक ऑफिस में ही जमा होंगे दस्तावेज

इस पूरी प्रक्रिया में लोगों को दूर-दूर न जाना पड़े, लंबी यात्रा न करनी पड़े, इसलिए दस्तावेज जमा करने का केंद्र पंचायत भवन या ब्लॉक ऑफिस में ही होगा। अगर अधिकारी दस्तावेज से संतुष्ट नहीं होते, तो व्यक्ति को सुनवाई का मौका दिया जाएगा, जिसमें उसका प्रतिनिधि भी शामिल हो सकता है। इतना ही नहीं अधिकारी जब दस्तावेज लेंगे या सुनवाई करेंगे, तो उसकी रसीद भी देंगे। इतना ही नहीं राज्य सरकार को चुनाव आयोग को पर्याप्त स्टाफ भी उपलब्ध कराना होगा।

DGP को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का निर्देश

शीर्ष अदालत ने पश्चिम बंगाल के DGP को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का निर्देश भी दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि आम लोगों पर कितना दबाव और तनाव है। एक करोड़ से ज्यादा लोगों को नोटिस भेज दिए गए हैं। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि गांगुली, दत्ता जैसे नाम अलग-अलग तरीके से लिखे जाते हैं, इसी वजह से लोगों को नोटिस भेज दिए गए। उन्होंने यह भी कहा कि कई मामलों में माता-पिता और बच्चे की उम्र में 15 साल से कम का अंतर होने पर भी नोटिस भेजा गया है। इस पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि 15 साल का उम्र का अंतर कैसे तार्किक गड़बड़ी हो सकता है? हमारे देश में छोटी उम्र में शादी हो जाती है।

पश्चिम बंगाल में SIR के तहत 1.25 करोड़ नोटिस जारी

ये तीन श्रेणियों में हैं

पहली- Mapped (2002 के SIR से जुड़े मतदाता)

दूसरी- Unmapped (2002 के SIR से न जुड़े मतदाता)

तीसरी- Logical Discrepancy- सबसे बड़ी श्रेणी

लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी

ऐसी जानकारी जो चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में तो है, लेकिन सामान्य तर्क (Logic) से मेल नहीं खाती

किन मामलों में माना जाता है?

मतदाता और माता-पिता के बीच उम्र का अंतर 15 साल या उससे कम का अंतर।

माता-पिता के नाम की स्पेलिंग अलग Ex-Datta/Dutta, Ganguly/Ganguli.

माता-पिता की डिटेल्स मैच न होना उम्र और जन्मतिथि में अंतर।

लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी मिलने पर एक्शन

चुनाव आयोग मतदाता को नोटिस भेजता है।

मतदाता से डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन का बोला जाता है।

जरूरत पड़ने पर सुनवाई भी की जाती है।

15 जनवरी को चुनाव आयोग ने कहा था- हम देश निकाला नहीं दे रहे

15 जनवरी को सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था- SIR के तहत आयोग सिर्फ यह तय करता है कि कोई व्यक्ति वोटर लिस्ट में रहने के योग्य है या नहीं। इससे सिर्फ नागरिकता वेरिफाई की जाती है। SIR से किसी का डिपोर्टेशन (देश से बाहर निकालना) नहीं होता, क्योंकि देश से बाहर निकालने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है।

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